आचार्यश्री महाश्रमण ने की अपने युवाचार्य की घोषणा

 


जयपुर, 27 जुलाई (हि.स.)। करीब 250 वर्षों पूर्व महामना भिक्षु स्वामी ने जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ की स्थापना की और उन्हाेंने अपने युवाचार्य के रूप में आचार्यश्री भारमलजी को चुना और वे ही तेरापंथ धर्मसंघ के द्वितीय आचार्य बने। इस प्रकार तेरापंथ धर्मसंघ में यह परंपरा चली कि आचार्य अपने भावी उत्तराधिकारी का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में अथवा युवाचार्य के रूप में घोषित कर देता है। वहीं युवाचार्य आगे चलकर तेरापंथ धर्मसंघ का नेतृत्वकर्ता बन सकता है। यह आचार्य परंपरा गतिमान होते हुए वर्तमान में ग्यारहवें आचार्य, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ चल रही है।

वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी, तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, संस्थापक, महामना आचार्यश्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत जारी ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ की सम्पन्नता के अवसर पर तेरापंथ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अपने तेरापंथ के भावी उत्तराधिकारी की घोषणा करते हुए अपने युवाचार्य के रूप में मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी के नाम की घोषणा जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य सुधर्मा सभा में उपस्थित विशाल जनमेदिनी के सम्मुख कर मानों तेरापंथ की परंपरा और आगे बढ़ा दिया। आचार्यश्री की इस घोषणा के साथ ही बुलंद जयघोष के साथ पूरा प्रवचन पण्डाल गूंज उठा।

आचार्यश्री ने भगवान महावीर को नमन करते हुए महामना आचार्यश्री भिक्षु स्वामी व पूर्वाचार्यों को श्रद्धायुक्त घोषणा करते हुए कहा कि आचार्यश्री भिक्षु ने जो मर्यादा, व्यवस्था दी। अतीत में आचार्य दशक सम्पन्न हुआ। आचार्यश्री तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने मुझे पर ध्यान दिया मुझे दायित्व दिया, उसे मैं अब तक निभाता आ रहा हूं, आगे भी निभाता रहूंगा। आज के अवसर पर मैं अपने उत्तराधिकारी के नाम की घोषणा करना चाहता हूं।

आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के नैकट्य में रहने का सुअवसर प्राप्त हुआ। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी के साथ मैं बालमुनि के रूप में भी रहा, बाद में व्यवस्थाओं की दृष्टि से भी सम्पर्क रहा। वर्तमान में साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी, साध्वीवर्या और मुख्यमुनि महावीरकुमार भी व्यवस्था पक्ष से जुड़े हुए हैं।

शासना की दृष्टि से हमारे धर्मसंघ में एक आचार्य की परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा आगे भी चलती रहे, स्वस्थ परंपरा आगे चलती रहे, उसके लिए एक नेतृत्व की व्यवस्था चलती रहे। हमारे धर्मसंघ में एक आचार्य का नेतृत्व रहता है।

आचार्यश्री ने परंपरानुसार नवनियुक्त युवाचार्य मुनि महावीरकुमारजी को अपने हाथों से उत्तरीय ओढ़ाते हुए कहा कि ये आचार्यश्री भिक्षु की परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास करते रहें।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव