गोडावण के लिए नहीं उजाड़ेंगे लोमड़ियों के घर : सऊदी अरब के मॉडल से सीख रहा वन विभाग, बोला-नेचुरल सिस्टम डिस्टर्ब नहीं करेंगे
जैसलमेर, 28 अक्टूबर (हि.स.)। जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क (डीएनपी) में गोडावण को बचाने के लिए वन विभाग ने लोमड़ियों के घर (मांद) को नष्ट करने की योजना पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही गोडावणों को जंगल में छोड़ने का अभियान जारी रहेगा।
डेजर्ट नेशनल पार्क के एसीएफ अशोक सिंह ने कहा कि लोमड़ियों को दूसरी जगह शिफ्ट करके नेचुरल सिस्टम को डिस्टर्ब नहीं किया जाएगा। अन्य गोडावण को भी सम के खुले एरिया में छोड़ने की प्रक्रिया जारी रहेगी।
दरअसल 18 अक्टूबर को कैप्टिव-ब्रेड गोडावणों में से एक युवा पक्षी मृत मिला था, जिसके करीब 100 मीटर दूर लोमड़ी की गुफा पाई गई थी। इसके बाद लोमड़ियों के ठिकाने उजाड़ने की चर्चा शुरू हुई, जिस पर वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने कड़ा विरोध करते हुए इसे प्राकृतिक संतुलन के खिलाफ बताया था।
वैज्ञानिक सऊदी अरब में 1986 से चल रहे हुबारा बस्टर्ड संरक्षण प्रोजेक्ट के अनुभवों को अपना रहे हैं। सऊदी अरब में शुरुआती दौर में छोड़े गए अधिकांश पक्षी शिकार हो गए थे। तब लोमड़ियों और जंगली बिल्लियों को हटाने के बावजूद नुकसान कम नहीं हुआ, क्योंकि बाज (ईगल) और उल्लू (आउल) जैसे शिकारी पक्षी भी खतरा बने हुए थे। इसके बाद जब उड़ने में सक्षम चार महीने के पक्षियों को छोड़ा गया, तो उनका सर्वाइवल रेट सुधरकर 50% तक पहुंचा और आबादी 300 से 400 तक पहुंच गई।
इसी अनुभव से सीख लेते हुए भारत में प्रोजेक्ट जीआईबी के वैज्ञानिकों ने छह महीने की उम्र के पक्षियों को जंगल में छोड़ने का फैसला किया है।
प्रोजेक्ट जीआईबी के लीड साइंटिस्ट डॉ. सुतीर्थ दत्ता के अनुसार, पहले चरण में छह महीने की उम्र वाले अधिकतम 10 गोडावणों को जंगल में छोड़ा जाएगा। इनकी वास्तविक संख्या पक्षियों की शारीरिक फिटनेस और स्वास्थ्य के आधार पर तय होगी। छह महीने की उम्र तक गोडावण अपने वयस्क आकार का करीब 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा हासिल कर लेते हैं और उड़ने में सक्षम हो जाते हैं।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि जंगली झुंड के साथ रहकर ये पक्षी प्राकृतिक माहौल में खुद को ढाल सकेंगे। जीएस भारद्वाज, डायरेक्टर, डब्ल्यूआईआई के अनुसार, केवल कैद में पाले गए पक्षी ही नहीं, बल्कि जंगल में जन्मे पक्षी भी शिकारियों के खतरे का सामना करते हैं।
इस संबंध में विशेषज्ञ डॉ. सुमित डऊकिया ने बताया, केवल ब्रीडिंग कराना काफी नहीं है। कैप्टिव पक्षियों को ऐसे शिकारियों से बचने का प्रशिक्षण देना मुश्किल है जिन्हें उन्होंने कभी देखा ही नहीं। इसलिए सुरक्षित प्राकृतिक आवास का विकास पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
डॉ. सुतीर्थ दत्ता के अनुसार, आने वाले वर्षों में हर साल करीब 30 गोडावणों को जंगल में छोड़ने की योजना है। यदि शुरुआती दौर में 30 से 35 प्रतिशत पक्षी भी जीवित रहने में सफल होते हैं, तो इससे देश में बची जंगली गोडावण आबादी को बढ़ाने में मदद मिल सकती है। फिलहाल जंगली गोडावणों की संख्या करीब 130 बताई गई है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / चन्द्रशेखर