अपनी पहचान के लिए सदियों से संघर्षरत है स्त्री: प्रो. चारण

 


जोधपुर, 14 सितम्बर (हि.स.)। वरिष्ठ कवि और आलोचक प्रो. अर्जुनदेव चारण ने कहा कि सौम्यता यानि सोम के जागृत तत्व के कारण ही स्त्री को सौम्या कहा जाता है। लेकिन स्त्री की अपनी दुविधा है। उसे आज भी अपनी पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। कोई भी उसे उसकी खुद की पहचान नहीं देना चाहता। चारण साहित्य अकादेमी (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार) और अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद के संयुक्त तत्वावधान में स्थानीय गांधी भवन में साहित्य, संस्कृति और स्त्री चेतना विषय पर आयोजित नारी चेतना कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।

प्रो. चारण ने कहा कि क्यों समाज में बार- बार स्त्री चेतना की गुहार सुनाई देती है। हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि स्त्री की चेतना चित्त से आती है, मन से नहीं। हमारे जीवन में जितनी भी चेतना है वो स्त्री से ही है। मां की सीख, जिससे हमें दया, करुणा व संवेदना की समझ पैदा होती है। संस्कृति को ठीक से समझेंगे तो ही हम स्त्री चित्त को समझ पाएंगे। सारस्वत अतिथि प्रो. सरोज कौशल ने कहा कि स्त्री स्वाभिमान को साहित्य का प्रमुख विषय बनाना चाहिए, क्योंकि स्त्रियों के पसीने और समर्पण से घर बने, परिवार सुशोभित हुए और राष्ट्र का रक्तप्रवाह अनवरत पोषित हुआ। स्त्रियां अब हाशिये से मुख्यधारा में आ रही हैं।

विशिष्ट अतिथि डॉ. मनोरमा उपाध्याय ने कहा कि साहित्य में स्त्री चेतना को मुख्य रूप से दो दृष्टियों से समझा जा सकता है, नारीवादी चेतना और स्त्रीत्व के प्रति चेतना। यह चेतना प्राचीन काल से लेकर आधुनिक साहित्य तक निरंतर प्रवाहित रही है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक चिंतक आशा बोथरा ने कहा कि स्त्री की दासता सामंती समाज में अधिक रही है, जहां वर्जनाएं भी बहुत थीं।

उन्होंने कहा कि यदि हम मन की सलवटों को समझते हैं तो यह जरूर स्वीकार करेंगे कि औरत का मानवीय रूप सहोदरा होने के बाद भी पूरी तरह स्वीकृत नहीं होता। समारोह के आरंभ में कार्यक्रम संयोजिका डॉ. पद्मजा शर्मा ने स्वागत उद्बोधन देते हुए अतिथियों का परिचय कराया। साहित्य अकादमी, दिल्ली के सहायक संपादक डॉ. सुशील द्विवेदी ने कार्यक्रम का संचालन किया और आभार ज्ञापित किया।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश