वेद, विज्ञान और चेतना का समन्वय ही विकसित भारत की आधारशिला : डॉ. ओम प्रकाश पांडेय
अजमेर, 16 अप्रेल(हि.स.)। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में वैदिक वाङ्मय विभाग द्वारा आयोजित वेद वेदांग और विकसित भारत विषय पर आयोजित संगोष्ठी में दिल्ली के प्रख्यात वैज्ञानिक, चिंतक एवं पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार -प्रधानमंत्री कार्यालय डॉ. ओम प्रकाश पांडेय ने ‘ॐ’ को ब्रह्मांडीय ध्वनि बताते हुए उसकी वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि समस्त सृष्टि कंपन (वाइब्रेशन) और ऊर्जा के सिद्धांत पर आधारित है तथा मानव कान वास्तविक ध्वनि नहीं, बल्कि उसकी आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) को ग्रहण करता है। उन्होंने ‘ॐ’ के उच्चारण की शुद्ध पद्धति पर प्रकाश डालते हुए इसे चेतना के उच्च स्तर से जोड़ने वाला माध्यम बताया।
उन्होंने वेदों को भारतीय ज्ञान-विज्ञान, खगोलशास्त्र, जीवविज्ञान तथा चेतना विज्ञान का मूल स्रोत बताते हुए कहा कि प्राचीन ऋषियों ने ध्यान और साधना के माध्यम से ब्रह्मांडीय रहस्यों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। उन्होंने वेदों में वर्णित सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते हुए प्रकाश की गति, ब्रह्मांड की संरचना, गुरुत्वाकर्षण, डीएनए संरचना तथा सृष्टि उत्पत्ति जैसे विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला और कहा कि यह ज्ञान भारतीय परंपरा में सहस्राब्दियों पूर्व विद्यमान था।
डॉ. पांडेय ने वेदांगों—शिक्षा (ध्वनि विज्ञान), कल्प (संस्कार एवं अनुष्ठान), व्याकरण (भाषिक संरचना), निरुक्त (शब्दार्थ), छंद (लय एवं मात्राएँ) तथा ज्योतिष (खगोल विज्ञान)—को वेदों की वैज्ञानिक व्याख्या का आधार बताते हुए कहा कि इनकी सहायता से ही वेदों के गूढ़ अर्थ को समझा जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वेदों को केवल व्याकरण से नहीं, बल्कि शोधपरक दृष्टिकोण एवं अनुभवजन्य ज्ञान (ऋषि-दृष्टि) से समझना आवश्यक है। अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय परंपरा की वैज्ञानिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि आज के कई आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांत—जैसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति (बिग बैंग), बहु-गैलेक्सी संरचना, प्रकाश के स्पेक्ट्रम, तथा जैविक संरचनाओं के सिद्धांत—प्राचीन वैदिक साहित्य में संकेत रूप में विद्यमान हैं। उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान में भी अंधविश्वास की प्रवृत्ति हो सकती है, अतः प्रत्येक तथ्य को तर्क और परीक्षण के आधार पर परखना चाहिए।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने कहा कि विकसित भारत केवल भौतिक प्रगति का प्रतीक नहीं, बल्कि संस्कार, एकता, आध्यात्मिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय से ही संभव है। उन्होंने भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, वेदों एवं ऋषि-मुनियों के वैज्ञानिक चिंतन का उल्लेख करते हुए इसे आधुनिक विज्ञान से जोड़ने की आवश्यकता बताई।
विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि वेद और वेदांग किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं, बल्कि “जीवन में प्रयुक्त होने वाली क्रियाशील बुद्धि हैं। उन्होंने कहा कि इनका अध्ययन केवल परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की बुनियादी आवश्यकता है।
इससे पूर्व विषय प्रवर्तन वैदिक वाङ्मय विभाग के संकायाध्यक्ष प्रोफेसर सुभाष चंद्र द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन अंजू अग्रवाल ने किया। आभार ज्ञापन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने किया | इस अवसर पर सीआरपीएफ से सुरेश कुमार तथा कोलकाता से आए ज्योतिषाचार्य राकेश पांडे की विशेष उपस्थिति रही। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के समस्त शिक्षकगण, अधिकारीगण, विद्यार्थी एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष