उदयपुर की बसावट अद्वितीय विरासत का उदाहरण : श्रीकृष्ण जुगनू
उदयपुर, 20 अप्रैल (हि.स.)। मेवाड़ की परंपरा में जल स्थापत्य, देव स्थापत्य और मानव स्थापत्य—इन तीनों का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। यह बात उदयपुर शहर के 475वें स्थापना दिवस के अवसर पर लोकजन सेवा संस्थान द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम के शुभारंभ पर मुख्य वक्ता के रूप में इतिहास व संस्कृतिविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू ने कही। उन्होंने कहा कि उदयपुर शहर की बसावट अपने आप में अनूठी है, जिसमें ओल, पोल, टिब्बा, सेहरी, मकान के साथ बाड़ी और बावड़ी जैसी परंपरागत संरचनाएँ शामिल हैं। इन ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। सोमवार को उदयापोल स्थित महाराणा उदयसिंह की आदमकद प्रतिमा पर पंचगव्य स्नान और पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच डॉ. विमल शर्मा के निर्देशन में दिलीप रावत और भव्य प्रताप सिंह ने प्रतिमा का पंचगव्य से अभिषेक किया। पुष्पांजलि कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व कुलपति प्रोफेसर उमा शंकर शर्मा ने की। कार्यक्रम में डॉ. राजेंद्र नाथ पुरोहित ने बताया कि उदियापोल पहले विशेष परिस्थितियों में ही खोला जाता था और इसका पुराना नाम कमलिया पोल था। बाद में महाराणा सज्जन सिंह के पुत्र जन्म के उपलक्ष्य में इसका नाम उदिया पोल रखकर इसे आम मार्ग के रूप में खोल दिया गया। प्रोफेसर राव गोविंद सिंह भारद्वाज ने कहा कि महाराणा उदय सिंह ने मुगल आक्रमणों से सुरक्षा के दृष्टिकोण से अरावली की कठोर चट्टानों और प्राकृतिक कंदराओं से घिरे सुरक्षित स्थान का चयन कर उदयपुर की स्थापना की थी।कार्यक्रम का संचालन जय किशन चौबे ने किया तथा डॉ. मनीष श्रीमाली ने आभार व्यक्त किया। संस्थान अध्यक्ष प्रोफेसर विमल शर्मा, प्रकाश अग्रवाल, ग्रुप कैप्टन गजेंद्र सिंह, डॉ. जयराज आचार्य, डॉ. रमाकांत शर्मा, इंद्र सिंह राणावत, मनोहर लाल मूंदड़ा, संध्या रावल, श्रीरत्न मोहता, ओम राठौड़, गोविंद शर्मा, मनीष गोलछा, दिलीप रावत, ओम प्रकाश माली, सुरेश तंबोली, गोविंद ओड आदि उपस्थित रहे। दूसरे दिन 21 अप्रैल को विद्यापीठ में उदयपुर की सांस्कृतिक विरासत विषय पर संगोष्ठी का आयोजन होगा।
हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता