जयपुर के पटाखा बाजार में बदला ट्रेंड: स्काई शॉट और बटरफ्लाई की बढ़ी मांग

 




जयपुर, 06 नवंबर (हि.स.)। दीपावली नजदीक आते ही राजधानी के बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है। दीपोत्सव की तैयारियों के बीच पटाखा बाजार में भी पसंद का ट्रेंड बदलता नजर आ रहा है। कभी दीपावली की पहचान रहे अनार, जमीन चक्कर और फुलझड़ी की मांग अब पहले जैसी नहीं रही। इनकी जगह स्काई शॉट, बटरफ्लाई सहित कई फैंसी पटाखों ने ले ली है। खासकर 300 से 400 फीट की ऊंचाई तक जाकर रंग-बिरंगी रोशनी बिखेरने वाले स्काई शॉट ग्राहकों को खूब लुभा रहे हैं। वहीं, ग्रीन पटाखों के प्रति भी लोगों का रुझान बढ़ा है।

राजधानी के पुराने आतिश मार्केट और परकोटे के विभिन्न बाजारों में पटाखों की खरीदारी शुरू हो गई है। कारोबारियों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में बिक्री का तरीका भी बदला है। पहले लोग दीपावली से 10 से 15 दिन पहले ही पटाखे खरीदने पहुंच जाते थे, लेकिन अब अधिकांश ग्राहक त्योहार से दो-तीन दिन पहले बाजार आते हैं। ऐसे में कारोबारियों को बिक्री में तेजी आने का इंतजार रहता है।

पटाखा विक्रेता सोहेल खान ने बताया कि इस बार बाजार में फैंसी पटाखों की नई किस्में आई हैं। इनमें स्काई शॉट और बटरफ्लाई की सबसे ज्यादा मांग है। स्काई शॉट आसमान में 300 से 400 फीट की ऊंचाई पर जाकर रंगीन रोशनी बिखेरते हैं। उन्होंने कहा कि अनार, जमीन चक्कर और फुलझड़ी जैसे परंपरागत पटाखों की मांग में कमी आई है। ग्राहक अब नए डिजाइन और आकर्षक रोशनी वाले पटाखे पसंद कर रहे हैं। कंपनियां शादी-ब्याह और बड़े आयोजनों में इस्तेमाल होने वाली आतिशबाजी को छोटे आकार में तैयार कर रही हैं, जिससे आम ग्राहक भी उसी तरह के आकर्षक प्रभाव वाले पटाखे खरीद पा रहे हैं।

पटाखा बाजार में बदलाव के बीच जयपुर की पारंपरिक आतिशबाजी कला भी अपनी पहचान खोती जा रही है। शहर की स्थापना के बाद से ही यहां आतिशबाजी बनाने की परंपरा रही है। जयपुर की शोरगर बिरादरी पीढ़ियों से इस कला में दक्ष रही है। यहां के कारीगर अनार, फ्लावर पॉट, जमीन चक्कर और फुलझड़ी जैसे पटाखे बनाने के लिए पहचाने जाते थे। हालांकि, समय के साथ यह परंपरा सिमटती चली गई। वर्तमान में जयपुर के बाजारों में बिकने वाले अधिकांश पटाखे तमिलनाडु के शिवकाशी से आ रहे हैं, जो देश में आतिशबाजी निर्माण का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।

पटाखा विक्रेता जहीर अहमद का कहना है कि समय के साथ पटाखों की डिजाइन और निर्माण तकनीक में बड़ा बदलाव आया है। पहले बड़े आयोजनों में इस्तेमाल होने वाली आतिशबाजी अब कंपनियां छोटे आकार में तैयार कर रही हैं। इनमें भी पहले जैसे आकर्षक प्रभाव देखने को मिलते हैं। उन्होंने कहा कि जयपुर के शोरगर कारीगर पारंपरिक आतिशबाजी बनाने में माहिर थे, लेकिन सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन के अभाव में यह कला मरणासन्न स्थिति में पहुंच गई है। सरकार हस्तकला को बढ़ावा देने की बात करती है, लेकिन शोरगर कारीगरों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा।

कारोबारियों के अनुसार पिछले दो वर्षों में बाजार में ग्रीन पटाखों की उपलब्धता बढ़ी है। उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों और निर्धारित मानकों के अनुरूप तैयार किए जाने वाले इन पटाखों में पारंपरिक पटाखों की तुलना में कम धुआं निकलने का दावा किया जाता है। सोहेल खान के मुताबिक, पटाखे प्रयोगशाला में जांच और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही बाजार में बिक्री के लिए आते हैं।

पटाखा बाजार में बदलता यह ट्रेंड केवल ग्राहकों की पसंद में बदलाव नहीं दर्शाता, बल्कि आतिशबाजी कारोबार की बदलती तस्वीर भी सामने रखता है। एक ओर स्काई शॉट और बटरफ्लाई जैसे आधुनिक पटाखे बाजार में छाए हुए हैं, तो दूसरी ओर कभी जयपुर की पहचान रही शोरगर कला संरक्षण के अभाव में सिमटती जा रही है। जिस शहर की आतिशबाजी कभी देश-दुनिया में मशहूर थी, उसी का बाजार आज बड़े पैमाने पर शिवकाशी से आने वाली खेप पर निर्भर होता जा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश