जापान में भी है साधक परंपरा - साकुराको आबे
जयपुर, 21 सितंबर (हि.स.)। जापानी फिल्मकार साकुराको आबे ने भारतीय संस्कृति और लोक परंपराओं की समृद्ध विरासत के प्रति अपने जुड़ाव को साझा करते हुए कहा कि जापान में भी साधक परंपरा है। उन्होंने बताया कि वहां की साधक परंपरा भारत की परंपराओं से मिलती-जुलती है। आबे ने यह जानकारी झालाना संस्थानिक क्षेत्र स्थित राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के सभागार में आयोजित पाठक पर्व को संबोधित करते हुए दी।
साकुराको आबे ने भारत और हिंदी भाषा के प्रति अपनी रुचि का उल्लेख करते हुए बताया कि वह भारत को जानना चाहती थीं। भारत में मिथिला की चित्रकला की प्रदर्शनी के दौरान उनकी मुलाकात प्रसिद्ध चित्रकार गंगादेवी से हुई, जिनसे वह काफी प्रभावित हुईं। इस मुलाकात ने भारतीय कला और संस्कृति के प्रति उनकी दिलचस्पी को और गहरा किया। इसी रुचि के चलते उन्होंने टोक्यो में हिंदी सीखी और वर्ष 1992 में शांतिनिकेतन में भी रहीं।
भारतीय लोक परंपराओं के संदर्भ में उन्होंने पार्वती बाउल का उल्लेख करते हुए कहा कि बाउल केवल गायक नहीं, बल्कि साधक भी होता है। शूटिंग के दौरान उन्हें इस परंपरा के आध्यात्मिक पक्ष को समझने का अवसर मिला। उन्होंने साधना और दैनिक जीवन की सामान्य क्रियाओं के बीच संबंध की ओर भी ध्यान दिलाया। बर्तन मांजने जैसी साधारण गतिविधि में भी प्रेम और समर्पण का भाव निहित हो सकता है। इस दृष्टिकोण में बाहरी चमक से अधिक महत्व उस प्रक्रिया और भाव का है, जिसके साथ कोई कार्य किया जाता है।
इस अवसर पर टोक्यो की साकुराको आबे द्वारा प्रसिद्ध बाउल गायिका पार्वती बाउल पर निर्मित डॉक्यूमेंट्री फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत में प्रसिद्ध कथावाचक राधेश्याम द्वारा रचित ‘राधेश्याम रामायण’ पर राजेन्द्र बोड़ा ने अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने ‘राधेश्याम रामायण’ की साहित्यिक और नाटकीय विशेषताओं पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। इस ग्रंथ का हर बार मुद्रण के समय संपादन किया जाता रहा। इसे 26 खंडों में विभाजित किया गया है। इसकी रचना में संवादों और चरित्रों की प्रस्तुति को विशेष महत्व दिया गया है।
‘राधेश्याम रामायण कथा में राम वनवास के प्रसंग में सीता और माता कौशल्या के संवाद का भी वाचन किया। इसमें लक्ष्मण और उर्मिला के संवाद का भी उल्लेख मिलता है। उर्मिला के संदर्भ में ‘उर्मिला उर मिला विदा करो’ की भावपूर्ण व्याख्या सामने आती है। कथा वाचक के लिए अपने चरित्र की शुद्धता और मर्यादा बनाए रखने के महत्व को भी रेखांकित किया गया। राम के प्रति समर्पण व्यक्त करते हुए कहा गया कि “राम ने ही मुझे बनाया।”
इस रामायण की एक विशिष्टता इसका नाटकीय मंचन के उद्देश्य से लिखा जाना है। चर्चा के दौरान बताया गया कि रामलीला की पटकथा के रूप में इसके संवादों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इसमें रामचरितमानस की भक्ति परंपरा और वाल्मीकि रामायण के आध्यात्मिक तत्वों का समन्वय देखने को मिलता है।
‘राधेश्याम रामायण’ के इतिहास से जुड़े प्रसंगों में जयपुर के महाराजा माधो सिंह द्वारा इसके कुछ अंशों में सुधार की आवश्यकता जताए जाने का उल्लेख किया गया। इसके बाद दीवान शांतिचंद्र सेन के बेटे अविनाश सेन ने राधेश्याम कथावाचक से इसमें सुधार करवाया और रामायण को निर्देशित भी किया।
इस ग्रंथ की लोकप्रियता का उल्लेख करते हुए बताया गया कि मोतीलाल नेहरू ने आनंद भवन में एक महीने तक रामकथा का आयोजन करवाया था। वहीं, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति भवन में 15 दिनों तक रामकथा का आयोजन करवाया। वर्ष 1940 में राधेश्याम कथावाचक ने निर्णय लिया कि वह इस रामायण के माध्यम से धन अर्जित नहीं करेंगे। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अब तक इसकी लगभग दो करोड़ प्रतियां बिक चुकी हैं।
इस अवसर पर राव शिवराजपाल सिंह, कल्याण सिंह शेखावत, अपूर्व जोशी, विनोद जोशी, डॉ. नीरज रावत, हिमांशु व्यास, एडवोकेट अनुज शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा, उमा शर्मा, डॉ. सुभाष कौशिक सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। ग्रासरूट मीडिया फाउंडेशन के अनुज शर्मा ने ‘पाठक पर्व’ के तहत आयोजित गतिविधियों की जानकारी साझा की और सभी अतिथियों एवं सहभागियों का आभार व्यक्त किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश