शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) से पुराने शिक्षकों को मिले राहत

 


जयपुर, 12 जून (हि.स.)। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान (विद्यालय शिक्षा) ने शुक्रवार को जयपुर स्थित प्रदेश कार्यालय में प्रेस वार्ता आयोजित कर मई 2010 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से मुक्त किए जाने के लिए केंद्र सरकार से विधायी हस्तक्षेप की माँग की है।

प्रदेश अध्यक्ष रमेश चंद्र पुष्करणा एवं प्रदेश महामंत्री महेन्द्र कुमार लखारा ने कहा कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से संबंधित माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 29 मई 2026 के निर्णय के बाद देश

के लाखों शिक्षकों में अपने भविष्य को लेकर चिंता और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

पूर्व में शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर ऐसी कोई अर्हता नहीं थी। पहली बार 23 अगस्त 2010 को राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) ने टीईटी को न्यूनतम अर्हता के रूप में अधिसूचित किया गया था। शिक्षकों की पुरानी भर्तियां उस समय के नियमों और निर्धारित चयन प्रक्रिया के अनुसार हुई। देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लाखों शिक्षकों की भर्तियां 2010 से पहले बगैर टेट की अर्हता के ही हुई, क्योंकि तब इस परीक्षा का प्रावधान ही नहीं था।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद इसे पुराने शिक्षकों के लिए भी अनिवार्य अर्हता बना दिए जाने से शिक्षक परेशान हैं।

शिक्षक नेताओं का कहना है कि बाद में निर्धारित पात्रता मानदंडों को पूर्व प्रभाव से लागू करना प्राकृतिक न्याय, समानता तथा विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

कोई भी नियम अथवा अधिसूचना सामान्यतः उसके लागू होने की तिथि से प्रभावी होती है। इसलिए 2010 में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई ) द्वारा शिक्षक भर्ती के लिए लागू की गई टेट की अनिवार्यता के दायरे से इससे पूर्व नियुक्त हुए शिक्षकों को बाहर रखने के लिए केंद्र सरकार विधायी और नीतिगत निर्णय लेकर राहत प्रदान करे।

प्रदेश महामंत्री महेन्द्र कुमार लखारा ने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बाद देश के शिक्षकों को अब केवल केंद्र सरकार ही राहत दिलवा सकती है। वर्तमान परिस्थितियों के कारण लाखों शिक्षकों एवं उनके परिवारों में असुरक्षा की भावना व्याप्त है। यदि इस विषय का शीघ्र समाधान नहीं हुआ तो इसका प्रभाव केवल शिक्षकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था की स्थिरता, विद्यार्थियों के हितों तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ेगा। अध्यक्ष पुष्करणा ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा दिए गए निर्णय का सम्मान करना सभी का संवैधानिक दायित्व है, किन्तु जनहित में आवश्यक नीतिगत एवं विधायी समाधान उपलब्ध कराना संसद एवं केंद्र सरकार का अधिकार और दायित्व है।

सरकार चाहे तो विशेष प्रावधान, विधायी संशोधन अथवा अन्य नीतिगत निर्णय के माध्यम से प्रभावित शिक्षकों को स्थायी राहत प्रदान कर सकती है।

शिक्षक नेताओं ने कहा कि यह केवल राजस्थान के शिक्षकों का मामला नहीं है। देशभर में शिक्षकों के बीच व्याप्त भ्रम एवं असमंजस की स्थिति को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे। इससे प्रशासनिक स्तर पर एकरूपता स्थापित होगी और शिक्षकों के हित सुरक्षित रहेंगे।

महासंघ ने मांग की है कि किसी भी पात्रता अथवा योग्यता मानदंड को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट) से लागू करने के प्रश्न पर न्याय, समानता एवं विधिक निश्चितता के सिद्धांतों के आलोक में पुनर्विचार किया जाए। इससे शिक्षकों को न्याय मिल सकेगा और भविष्य में ऐसे विवादों की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश