उच्चतम न्यायालय के निर्णय का स्वागत, अनुसूचित समाज के अधिकारों से समझौता नहीं होगा : विहिप
जयपुर, 25 मार्च (हि.स.)। विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने उच्चतम न्यायालय के हालिया निर्णय का स्वागत करते हुए इसे संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय और विधि के शासन को मजबूत करने वाला बताया है।
विहिप जयपुर महानगर अध्यक्ष राजेन्द्र मीणा ने कहा कि न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धर्मांतरण के बाद कोई भी व्यक्ति अनुसूचित जाति की संवैधानिक श्रेणी में नहीं आता और उसे एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की भावना के अनुरूप है, जिसमें केवल हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म के अनुयायियों को ही अनुसूचित जाति की श्रेणी में माना गया है।
विहिप जयपुर महानगर कोषाध्यक्ष आलोक बालाहेड़ी ने कहा कि यह फैसला उन प्रवृत्तियों पर रोक लगाएगा, जिनमें धर्मांतरण के बाद भी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर संवैधानिक लाभ लेने का प्रयास किया जाता है। डॉ. जैन के अनुसार, इस निर्णय से धर्मांतरण माफिया को करारा झटका लगा है।
बालाहेड़ी ने कहा कि अनुसूचित जाति को दिए गए अधिकार ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय को दूर करने के लिए हैं, जो विशेष रूप से हिन्दू समाज की संरचना में उत्पन्न हुए। ऐसे में, यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करता है, तो वह उस सामाजिक संदर्भ से स्वयं को अलग कर लेता है, जिसके आधार पर ये अधिकार प्रदान किए गए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति पुन: हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म में लौटता है और समाज उसे स्वीकार करता है, तभी वह पुन: अनुसूचित जाति के अधिकारों का पात्र हो सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश