श्रद्धापूर्वक मनाई ऋषि पंचमी, ऋषियों व पूर्वजों का किया तर्पण

 


जोधपुर, 15 सितम्बर (हि.स.)। ऋषि पंचमी का पर्व मंगलवार को श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इस एक ही दिन में दिन अलग-अलग आयोजन हुए। सुबह लोगों ने तालाबों में श्रावणी कर्म कर पितृ तर्पण किया। दोपहर में ऋषि पूजन कर हमारे ऋषियों को याद किया और हवन में आहुतियां दी। इसके साथ ही जो लोग रक्षा बंधन पर राखी नहीं बंधवाते, उन लोगों ने राखी बंधवाई। कई समाज ऋषि पंचमी को ही रक्षा बंधन का पर्व मनाते हैं।

ऋषि पंचमी पर्व पर आज जोधपुर सहित देश भर में ऋषियों और पूर्वजों का तर्पण किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने पवित्र नदी-सरोवरों में स्नान कर पितृ देवों को जल चढ़ाया। कई स्थानों पर श्रीमाली ब्राह्मण समाज ने परंपराओं का पालन करते हुए ऋषियों का पूजन कर तर्पण किया और व्रत रखा। ऋषि पंचमी का पर्व सप्त ऋषियों को समर्पित है और इस दिन व्रत करने का विशेष महत्व है, जिससे रजस्वला दोष से मुक्ति मिलती है। ऋषि पंचमी के अवसर पर श्रीमाली समाज की महिलाओं ने पवित्र सरोवर पदमसर सहित पवित्र जलाशयों पर ऋषियों व पितरों को जल अर्पण किया।

यह है मान्यता

मान्यता के अनुसार श्रीमाली समाज की महिलाओं द्वारा वर्ष में एक बार ऋषि पंचमी के अवसर पर सप्त ऋषियों व अपने कुल के पितरों को जल अर्पण किया जाता है। व्रतधारी महिलाओं ने अपने ससुराल और पीहर पक्ष की तीन-तीन पीढिय़ों के ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों को याद कर उनके मोक्ष और सद्गति के लिए तर्पण किया और अपने पूरे दिन के व्रत का पुण्यफल पूर्वजों को समर्पित किया। तर्पण के बाद महिलाओं ने नीम, आक, पीपल, बोल्टी और हाटी-काटी जैसे पवित्र वृक्षों की पूजा की और समाज की बुजुर्ग महिलाओं से ऋषि पंचमी की पौराणिक कथाएं सुनीं। व्रत के पारणे के लिए घरों में मणीचे (बिना बोया हुआ धान) की खीर, मणीचे के आटे का हलवा, तुरई-काचरे की सब्जी और केर-सांगरी का रायता बनाया जाता है। इन पकवानों को पहले सप्तऋषि, ऋषि पत्नियों और सात पीढिय़ों के पूर्वजों को अर्पित करने के बाद महिलाएं स्वयं ग्रहण करती हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश