हर बुखार का कारण बैक्टीरिया या वायरस नहीं - डॉ. जी.एस. तंवर
बीकानेर, 25 अक्टूबर (हि.स.)। बच्चों में बुखार आते ही अक्सर संक्रमण की आशंका के कारण एंटीबायोटिक दवाएँ शुरू कर दी जाती हैं, लेकिन हर बुखार का कारण बैक्टीरिया या वायरस नहीं होता। कई बार बुखार के पीछे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियाँ, गठिया एवं अन्य सूजन संबंधी रोग, रक्त और अस्थि मज्जा की बीमारियाँ तथा दवाओं से होने वाली एलर्जी भी जिम्मेदार हो सकती हैं। ऐसे मामलों में सही समय पर बीमारी की पहचान न केवल अनावश्यक दवाओं से बचाती है, बल्कि बच्चे को गंभीर जटिलताओं से भी बचा सकती है।
इसी महत्वपूर्ण संदेश के साथ सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज, बीकानेर के बाल रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. जी.एस. तंवर ने पुष्कर में 24 एवं 25 अक्टूबर 2026 को आयोजित गोल्डन जुबली राजपेडिकॉन एवं नॉर्थ जोन पेडिकॉन में “हर बुखार संक्रमण नहीं है : संक्रमण जैसी दिखने वाली बीमारियों की पहचान” विषय पर केस आधारित पैनल चर्चा का संचालन किया। उनकी प्रस्तुति का मुख्य उद्देश्य चिकित्सकों को यह समझाना था कि बुखार के हर मामले में केवल संक्रमण खोजने के बजाय बच्चे के लक्षणों, शारीरिक परीक्षण और जाँच रिपोर्टों का समग्र आकलन करना आवश्यक है।
डॉ. तंवर ने बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में अपने कार्यकाल के दौरान देखे गए जटिल बाल रोगों के उदाहरणों के माध्यम से बताया कि कई बीमारियाँ शुरुआत में संक्रमण जैसी दिखाई देती हैं। उन्होंने कावासाकी रोग, रक्त एवं अस्थि मज्जा से संबंधित बीमारियों, रूमेटोलॉजी यानी प्रतिरक्षा एवं सूजन संबंधी रोगों तथा दवाओं से होने वाले बुखार के मामलों को केस आधारित चर्चा के जरिए प्रस्तुत किया।
प्रस्तुति में एक महत्वपूर्ण उदाहरण ऐसे बच्चे का था, जिसे कई दिनों से तेज बुखार, आँखों में लालिमा, शरीर पर चकत्ते, होंठों में बदलाव और हाथ-पैरों में सूजन थी। प्रारंभ में संक्रमण की आशंका के कारण उपचार किया गया, लेकिन बुखार कम नहीं हुआ। विस्तृत चिकित्सकीय परीक्षण से कावासाकी रोग की पहचान हुई, जिसमें हृदय की रक्त वाहिकाओं, विशेषकर कोरोनरी धमनियों, को नुकसान पहुँचने का खतरा रहता है। यह उदाहरण बताता है कि सही समय पर बीमारी की पहचान और उपचार कितना महत्वपूर्ण है।
डॉ. तंवर ने जोर दिया कि लगातार बुखार, उपचार के बावजूद सुधार न होना और आँखों, त्वचा, होंठों या हाथ-पैरों में असामान्य बदलाव दिखना ऐसे संकेत हैं, जिनमें बच्चे का दोबारा और सावधानीपूर्वक मूल्यांकन जरूरी है।
प्रस्तुति में बताया गया कि एंटीबायोटिक दवाएँ बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण में उपयोगी होती हैं, जबकि वायरस के विरुद्ध इनका सामान्यतः लाभ नहीं होता। इसी प्रकार, जब बुखार का कारण कोई गैर-संक्रामक बीमारी हो, तो केवल बार-बार एंटीबायोटिक बदलने से मूल समस्या का समाधान नहीं होता।
ऐसे मामलों में विस्तृत इतिहास, बार-बार चिकित्सकीय परीक्षण और जरूरत के अनुसार लक्षित जाँचों के आधार पर निदान तक पहुँचना चाहिए। इससे अनावश्यक दवाओं, उनके दुष्प्रभावों और एंटीबायोटिक प्रतिरोध के खतरे को कम करने में मदद मिलती है।
इस प्रतिष्ठित क्षेत्रीय सम्मेलन में बीकानेर के अनेक वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञों ने विभिन्न वैज्ञानिक सत्रों में भाग लिया तथा सत्रों की अध्यक्षता की। इनमें डॉ. पी.सी. खत्री, डॉ. महेश शर्मा, डॉ. चंद्र कुमार चहार, डॉ. श्याम अग्रवाल, डॉ. मुकेश बेनीवाल, डॉ. पवन दारा, डॉ. संतोष चांडक, डॉ. गौरव पारीक और डॉ. धीरज शर्मा सहित अन्य विशेषज्ञ शामिल रहे। डॉ. नरेंद्र पारीक ने भी सम्मेलन में सहभागिता की।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव