हमारा राजस्थान 126 देशों से बड़ा, जज न्याय देने के लिए 1 हजार किमी की यात्रा करते है-जस्टिस भाटी

 




जयपुर, 22 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस पुष्पेन्द्र भाटी ने कहा कि आमजन हम से उम्मीद करता है कि जब उसका जीवन खतरे में होगा, जब उसे आर्थिक नुकसान हो रहा होगा, जब उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात होगी, तब न्यायपालिका और लीगल सिस्टम उसकी आवाज को उठाएगा। संकटमोचक की तरह उसकी रक्षा करेगा। जस्टिस भाटी साइबर सेफ्टी सेमिनार के समापन सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होने सभागार में मौजूद न्यायिक अधिकारियों से कहा कि आप उस राजस्थान का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो क्षेत्रफल के लिहाज से 126 देशों से बड़ा हैं। जिसमें हमारे न्यायिक अधिकारी न्याय देने के लिए एक हजार किलोमीटर की यात्रा करते हैं।

जस्टिस पुष्पेन्द्र भाटी ने कहा कि एक बार हमें दिल्ली के जज कह रहे थे कि ट्रांसफर बहुत छोटी बात हैं। क्योंकि दिल्ली न्याय क्षेत्र में ट्रांसफर का मतलब है, दस-बीस-तीस किलोमीटर, लेकिन हमने उन्हें गर्व से कहा कि हमारे यहां एक जगह से दूसरी जगह जाने में सैकड़ों किलोमीटर और कभी-कभी हजारों किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता हैं, लेकिन उसके बाद भी प्रदेश के न्यायिक अधिकारी पूरी ताकत से आमजन को न्याय देने के लिए काम कर रहे हैं।

समापन सत्र को संबोधित करते हुए केन्द्रीय कानून मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने कहा कि किसी भी टेक्नोलॉजी को रोका नहीं जा सकता है। टेक्नोलॉजी सुविधा के साथ आशंकाएं भी लाती हैं। देश में जब कंप्यूटर आया था तो उसका भी विरोध हुआ था। अभी इंडस्ट्री 4.0 चल रहा हैं। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स, 3D प्रिंटिंग, ब्लॉकचेन और इंटरनेट ऑफ थिंग्स का दौर चल रहा हैं। वहीं साइबर अपराध भी इसी की देन हैं, लेकिन हमें इससे डरने की जरूरत नहीं हैं। उन्होने कहा कि 21वीं सदी एशिया की होगी और भारत उसका नेतृत्व करेगा। ऐसे में भारत ही साइबर अपराध का हल भी खोजेगा।

समापन सत्र को संबोधित करते हुए हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा ने कहा कि आज आंखों से दिखने वाली चीज भी सत्य हो, यह जरूरी नहीं। डीपफेक और एआई के युग में न्यायाधीशों को भी आउट ऑफ द बॉक्स सोचने की जरूरत है। उन्होने कहा कि प्रदेश में कांस्टेबल स्तर के पुलिसकर्मियों को साइबर सिक्योरिटी की ट्रेनिंग दी जा रही हैं, लेकिन हमारा मानना है कि पुलिस के उच्चाधिकारियों को भी इस तरह की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। क्योंकि अब साइबर क्राइम के सिर्फ आंकड़े गिनने से काम नहीं चलेगा। इसके लिए न्यायिक प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता और त्वरित जांच ही असली समाधान हैं। उन्होंने न्यायिक अकादमियों से विशेष साइबर अपराध प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू करने का आग्रह भी किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / पारीक