विश्व काराकल दिवस पर राजस्थान में रणथम्भौर से शुरू हुआ ‘प्रोजेक्ट काराकल’

 


जयपुर, 23 मई (हि.स.)। राजस्थान वन विभाग ने विश्व काराकल दिवस के अवसर पर देश की सबसे दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों में शामिल काराकल के संरक्षण और वैज्ञानिक निगरानी के लिए महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए ‘प्रोजेक्ट काराकल’ की शुरुआत की है। इस परियोजना का पहला केंद्र रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान और उससे जुड़े ग्रेटर रणथम्भौर लैंडस्केप क्षेत्र को बनाया गया है।

वन विभाग के अनुसार यह क्षेत्र वर्तमान में काराकल का प्रमुख और अंतिम सुरक्षित प्राकृतिक आवास माना जाता है।

काराकल एक दुर्लभ जंगली बिल्ली प्रजाति है, जो अपनी असाधारण फुर्ती, तेज गति और शिकार करने की अनोखी क्षमता के लिए जानी जाती है। इसके लंबे काले गुच्छेदार कान इसकी सबसे बड़ी पहचान हैं। यह प्रजाति मुख्य रूप से खुले वन क्षेत्रों, घासभूमि और झाड़ीदार इलाकों में निवास करती है। विशेषज्ञों के अनुसार काराकल की मौजूदगी किसी भी क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन और घासभूमि तंत्र की सेहत का महत्वपूर्ण संकेतक मानी जाती है।

वन विभाग द्वारा शुरू किए गए ‘प्रोजेक्ट काराकल’ के तहत काराकल की संख्या, गतिविधियों, आवासीय क्षेत्रों और प्रजनन व्यवहार की वैज्ञानिक तरीके से निगरानी की जाएगी। इसके लिए कैमरा ट्रैप, फील्ड सर्वे, जीआईएस मैपिंग और आधुनिक वन्यजीव मॉनिटरिंग तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। साथ ही काराकल के प्राकृतिक आवासों को सुरक्षित रखने और मानव गतिविधियों के प्रभाव को कम करने के प्रयास भी किए जाएंगे।

वन अधिकारियों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलते भू-उपयोग, चराई दबाव और मानव हस्तक्षेप के कारण काराकल के प्राकृतिक आवास सिकुड़ते गए हैं। ऐसे में यह परियोजना इस दुर्लभ प्रजाति के अस्तित्व को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।

परियोजना के माध्यम से स्थानीय समुदायों को भी संरक्षण गतिविधियों से जोड़ा जाएगा ताकि वन्यजीव और मानव के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।

डीसीएफ मानस सिंह ने बताया कि ‘प्रोजेक्ट काराकल’ केवल एक प्रजाति संरक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि संपूर्ण घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करने की दिशा में व्यापक पहल है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना से रणथम्भौर क्षेत्र की जैव विविधता संरक्षण गतिविधियों को नई दिशा मिलेगी और भविष्य में इसे अन्य उपयुक्त क्षेत्रों तक भी विस्तारित किया जा सकता है।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार भारत में काराकल की संख्या अत्यंत सीमित रह गई है और राजस्थान उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है जहां इसकी उपस्थिति दर्ज की जाती रही है। ऐसे में राजस्थान वन विभाग की यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है।

संरक्षण विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह दुर्लभ प्रजाति भविष्य में पूरी तरह विलुप्त होने के खतरे में आ सकती है।

‘प्रोजेक्ट काराकल’ की शुरुआत के साथ राजस्थान ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक और अहम कदम बढ़ाया है। इससे न केवल काराकल जैसे दुर्लभ जीवों को संरक्षण मिलेगा, बल्कि प्रदेश की समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को भी दीर्घकालिक सुरक्षा मिल सकेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित