16 दिन रहेगा पितृपक्ष: पूर्णिमा श्राद्ध से होगी शुरुआत
जयपुर, 25 सितंबर (हि.स.)। पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व पितृपक्ष शनिवार से शुरू होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. महेंद्र मिश्रा के अनुसार इस बार अष्टमी तिथि का क्षय होने के कारण पूर्णिमा सहित श्राद्ध पक्ष 16 दिन का रहेगा। पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है। इसे पितृयज्ञ तथा पितृपक्ष को महालय भी कहा जाता है।
शनिवार को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। इसके बाद 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 को द्वितीया, 29 को तृतीया, 30 सितंबर को चतुर्थी-पंचमी, 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 को सप्तमी और 3 अक्टूबर को अष्टमी का श्राद्ध होगा। 4 अक्टूबर को नवमी श्राद्ध होगा, जिसमें सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध करने की परंपरा है। 5 अक्टूबर को दशमी, 6 को एकादशी, 7 को द्वादशी, 8 को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। अग्नि या शस्त्र से मृत्यु होने वाले लोगों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में करने का विधान है। 10 अक्टूबर को अमावस्या के साथ सर्वपितृ श्राद्ध होगा। इसके अगले दिन 11 अक्टूबर को मातृकुल के पूर्वजों के निमित्त मातामह श्राद्ध किया जाएगा।
परंपरा के अनुसार परिवार के दिवंगत सदस्यों का उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध से पितर प्रसन्न होकर परिवार को दीर्घायु, संतान, धन, विद्या, सुख-समृद्धि और मोक्ष का आशीर्वाद देते हैं। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात हो, उनका श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है। मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होने पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करने का विधान है।
डॉ. महेंद्र मिश्रा के अनुसार श्राद्ध के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर संकल्प लेना चाहिए। मध्यान्ह काल में पूर्वज का नाम और गोत्र लेकर पितरों का आह्वान किया जाता है। इसके बाद तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। देव तर्पण के लिए पूर्व दिशा, ऋषि तर्पण के लिए उत्तर दिशा और पितृ तर्पण के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करने की परंपरा है।
पितृ तर्पण में कुशा, काले तिल और जल लेकर पूर्वजों के नाम-गोत्र का स्मरण किया जाता है। ‘ॐ पितृभ्यो नम:’ मंत्र के उच्चारण के साथ जल अर्पित किया जा सकता है। मंत्र याद न होने पर पूर्वजों का नाम लेकर भी जल अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।
श्राद्ध के लिए काले तिल, कुशा, जौ, चावल, गंगाजल, दूध, शहद, घी, फूल और पात्र प्रमुख सामग्री मानी जाती है। तर्पण में जल, काले तिल, जौ, कुशा और पवित्री का उपयोग किया जाता है।
परंपरा के अनुसार तर्पण में हाथ के अलग-अलग स्थानों को विभिन्न तीर्थों से जोड़ा गया है। देवताओं को सूर्य को अर्घ्य उंगलियों के अग्रभाग से देव तीर्थ से दिया जाता है। अंगूठे और तर्जनी के बीच का स्थान पितृ तीर्थ माना जाता है और इसी से पितरों को जल अर्पित किया जाता है। कनिष्ठिका के मूल भाग को प्रजापति तीर्थ माना गया है। पितृ तर्पण में तर्जनी और अंगूठे के मध्य से बाहर की ओर जल छोड़ने की परंपरा है।
तीन पीढ़ियों—पिता, दादा और परदादा—के निमित्त अलग-अलग जल अर्पित करने की परंपरा भी बताई गई है। इस दौरान पूर्वजों का नाम और गोत्र स्मरण कर श्रद्धापूर्वक तर्पण किया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश