समाज सुधारक, पर्यावरण संरक्षक गुरु जाम्भोजी की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक- प्रो. दीक्षित

 


बीकानेर, 11 जनवरी (हि.स.)। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि समाज सुधारक, पर्यावरण संरक्षक, दूरदृष्टा गुरु जाम्भोजी की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक हैं। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय में गुरु जम्भेश्वर के नाम से एक भवन का नामकरण किया जाएगा, साथ ही विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में जाम्भाणी साहित्य रखा जाएगा। विश्वविद्यालय द्वारा राजस्थानी साहित्य एवं जाम्भाणी साहित्य में शोध कार्य को प्रोत्साहन दिया जाएगा तथा इस संबंध में जाम्भाणी साहित्य अकादमी से अनुबंध किया जाएगा।

प्रो. दीक्षित रविवार को जाम्भाणी साहित्य अकादमी सभागार में राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी तथा जाम्भाणी साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘राजस्थानी भाषा एवं साहित्य में जाम्भाणी साहित्य का योगदान’ विषयक एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा झीणी वाणी पत्रिका के लोकार्पण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

प्रो. दीक्षित ने कहा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता मिलने से इसका चहुंमुखी विकास होगा। उन्होंने बताया कि गुरु जाम्भोजी पर शोध कार्य करने के लिए अमेरिका से शोधार्थी बीकानेर आ रहे हैं। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए झीणी वाणी के सम्पादक डॉ. बनवारी लाल सहू ने कहा कि इस पत्रिका के माध्यम से जाम्भोजी के विचारों को पूरे विश्व तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। गुरु जाम्भोजी की सबदवाणी में भौतिक व आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित समस्त ज्ञान मौजूद है।

सारस्वत वक्ता के रूप में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित ने कहा कि जाम्भाणी साहित्य का समृद्ध साहित्य भण्डार राजस्थानी भाषा की अनमोल धरोहर है।

महंत डॉ. सच्चिदानंद जी आचार्य ने कहा कि आज पाठकों की कमी है व लोगों में अध्ययन के प्रति रुचि कम हो रही है। झीणी वाणी पत्रिका द्वारा युवा लेखकों को प्रोत्साहन मिलेगा।

विशिष्ट वक्ता के रूप में राजकीय महाविद्यालय सूरसागर, जोधपुर के सहायक आचार्य हिन्दी डॉ. प्रकाशदान चारण ने कहा कि जाम्भाणी साहित्य में राजस्थानी लोक, संस्कार, शब्दावली के साक्षात दर्शन होते हैं।

बीज वक्ता डॉ. कृष्णलाल बिश्नोई, राजस्थानी भाषा अकादमी के सचिव शरद केवलिया ने भी विचार रखे।

कार्यक्रम संयोजक डॉ. हरिराम बिश्नोई ने राजस्थानी भाषा व साहित्य में जाम्भाणी साहित्य के योगदान की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की।

जाम्भाणी साहित्य अकादमी के महासचिव विनोद जम्भदास ने स्वागत भाषण देते हुए जाम्भाणी साहित्यकारों की जानकारी दी व अकादमी उपाध्यक्ष राजाराम धारणियां ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

इससे पहले अतिथियों ने झीणी वाणी पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण किया। अतिथियों का शॉल, स्मृति चिन्ह्, पुष्प गुच्छ व साहित्य भेंट कर अभिनंदन किया गया। इस अवसर पर बस्तीराम बिश्नोई तथा हीराराम बिश्नोई को सम्मानित भी किया गया। पूर्व पार्षद सुधा आचार्य ने शंखनाद किया।

कार्यक्रम में इंद्रजीत धारणिया, सूबेदार केहराराम, सोहनलाल सिहाग, मोहनलाल लोमरोड़, रामस्वरूप बिश्नोई, डॉ. सुनील धारणिया, उदाराम खिलेरी, गोवर्धन बांगड़वा, बुधाराम कड़वासरा, जीवनराम गोदारा, डॉ. इंद्रदान चारण, रामसिंह कस्वां, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, डॉ. मोहम्मद फारूक, डॉ. नमामीशंकर आचार्य, ओमप्रकाश मांजू, अर्जुन खिलेरी, रत्ना बिश्नोई, डॉ. संतोष बिश्नोई, सुभाष खींचड़, जुगलकिशोर पुरोहित, हिमांशु टाक, रामावतार, राजेश चौधरी, प्रशांत जैन, विमला बिश्नोई, संपत बिश्नोई, रामेश्वर सिहाग, पुखराज, शिवराज, सुदेश, जीतराम, सहीराम सहित हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के विभिन्न जिलों से आये लोग उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव