पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता का पर्व कनागत 26 सितंबर से
जयपुर, 18 सितंबर (हि.स.)। दिवंगत पितृगणों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता का पर्व पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 11 अक्टूबर तक चलेगा। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करेंगे। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों का आशीर्वाद परिवार को प्राप्त होता है। जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात हो, उनका श्राद्ध उसी तिथि पर किया जाता है। तिथि ज्ञात नहीं होने पर सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध का विधान है। इस दौरान तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराने की परंपरा है। पंडित बनवारी लाल शर्मा के अनुसार पितरों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है। इसे पितृयज्ञ और पितृपक्ष को महालय भी कहते हैं।
26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध होगा। 27 को प्रतिपदा, 28 को द्वितीया, 29 को तृतीया, 30 को चतुर्थी, 1 अक्टूबर को पंचमी, 2 को षष्ठी, 3 को सप्तमी, 4 को अष्टमी, 5 को नवमी, 6 को दशमी, 7 को एकादशी, 8 को द्वादशी, 9 को त्रयोदशी और 10 अक्टूबर को चतुर्दशी श्राद्ध होगा। 11 अक्टूबर को अमावस्या का श्राद्ध यानी सर्वपितृ अमावस्या रहेगी।
शर्मा के अनुसार तर्पण में जल, काले तिल, जौ, कुशा और पवित्री का उपयोग किया जाता है। सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनकर संकल्प लें। पूर्वज का नाम और गोत्र लेकर पितरों का आह्वान करें। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुशा, काले तिल और जल लेकर पितरों के नाम-गोत्र का स्मरण करते हुए तर्पण करें। ‘ओम पितृभ्यो नम:’ जैसे सरल मंत्र से जल अर्पित किया जा सकता है। मंत्र याद न हों तो पूर्वजों का नाम लेकर श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करना भी पर्याप्त माना गया है। श्राद्ध के लिए काले तिल, कुशा घास, जौ, चावल, गंगाजल, दूध, शहद, घी, फूल और पीतल के बर्तन मुख्य सामग्री मानी जाती हैं। पूर्वजों को खीर, पूरी और चावल का प्रसाद अर्पित किया जाता है। भोजन में से गाय, कौआ, कुत्ते और चींटी के लिए भी अंश निकाला जाता है।
उंगलियों के बीच से जल अर्पित करने की प्रक्रिया को ‘पितृ तीर्थ’ कहा जाता है। परंपरा के अनुसार पिता, दादा और परदादा सहित तीन पीढिय़ों के निमित्त अलग-अलग जल अर्पित किया जाता है। तर्पण करते समय पितरों का नाम और गोत्र स्मरण किया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश