अंतर्मन की शांति और आनंद पाने के लिए रोज करें संबोधि ध्यान योग साधना - ललितप्रभ

 


जोधपुर, 01 अक्टूबर (हि.स.)। संत ललित प्रभ महाराज ने कहा कि अंतर्मन की शांति और आनंद पाने के लिए संबोधि ध्यान योग साधना के प्रयोग हमें रोज करने चाहिए। संबोधि का अर्थ है सम्यक होश और बोध पूरक जीवन जीना। दूसरों को जानना संसार है और खुद को जानना संबोधि ध्यान है। हमें पूरी दुनिया का ज्ञान है, पर हम खुद को भूले हुए हैं इसीलिए जीवन में सैकड़ों समस्याएं हैं मन में तनाव और अशांति है। खुद को जानना, खुद में डूबना, खुद को पाना और प्रेम, शांति और सजगता पूरक जीवन जीना ही संबोधि ध्यान योग साधना है।

संत गुरुवार को कायलाना रोड स्थित संबोधि धाम में 5 दिवसीय संबोधि मेडिटेशन कैंप के शुभारंभ पर देशभर से आए सैकड़ों साधकों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मन की शांति और आत्मा का आनंद पाने के लिए संबोधि-साधना राजमार्ग है। इस साधना से हमारे तन और मन के रोग कटते हैं, दिल और दिमाग में स्वास्थ्य और संतुलन का संचार होता है, अंतर्मन में ज्ञान के नए रहस्य उद्घाटित होते हैं, हृदय में मुक्ति का कमल खिलता है और रोम-रोम में प्रसन्नता तथा पवित्रता का संचार होने लगता है।

उन्होंने कहा कि संबोधि में दो शब्द हैं - सम् और बोधि अर्थात सही बोध, सत्य का बोध। हमारे जीवन का एक ही परम लक्ष्य है - आत्मिक शांति और संबोधि की प्राप्ति, जिसे उपलब्ध होने पर हम समस्त प्रकार के दुख, अशांति व तनावों से मुक्त हो जाते हैं और प्रतिपल परम शांति और असीम आनंद का अनुभव करते हैं।

उन्होंने कहा कि संबोधि-साधना पथ के 5 मील के पत्थर हैं - 1. सहजता अर्थात ईजीनेस 2. सकारात्मकता अर्थात पॉजिटिवनेस 3. सचेतनता अर्थात अवेयरनेस, 4. प्रसन्नता अर्थात हैप्पीनेस, 5. निर्लिप्तता अर्थात फ्रीनेस। संबोधि साधना में इस पूरे पंचामृत को जीवन में आत्मसात करने के प्रयोग करवाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि संबोधि ध्यान मार्ग के रूप में साधना का जो स्वरूप स्थापित किया है वह ध्यानयोग के विभिन्न पहलुओं को जीवन में जोड़कर और अनुभवों की कसौटी पर कस कर ही प्रस्तुत किया है। अनुत्तर योगी भगवान महावीर, तथागत गौतम बुद्ध और महान योगी महर्षि पतंजलि के साधनागत निर्देशों को संबोधि-साधना में शामिल किया गया है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश