जोधपुर शहर में दो मार्च को होगा होलिका दहन, अगले दिन चंद्र ग्रहण
शहर में दो मार्च को होगा होलिका दहन, अगले दिन चंद्र ग्रहण
तीन मार्च को सुबह 6.20 बजे लग जाएगा सूतक
जोधपुर, 28 फरवरी (हि.स.)। इस वर्ष होली के पावन पर्व पर भद्रा और खग्रास चंद्र ग्रहण का एक अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस कारण होलिका दहन दो मार्च को किया जाएगा। वहीं इसके अगले दिन चंद्र ग्रहण रहेगा। हालांकि होली खेलने में ग्रहण बाधक नहीं बनेगा लेकिन सूतक लगने के कारण मंदिरों के पट बंद रहेंगे और धार्मिक व मंगल कार्य नहीं होंगे।
ज्योतिषियों के अनुसार होली का पर्व 2 और 3 मार्च को मनाया जाएगा। दो मार्च को होलिका दहन किया जाएगा, जबकि अगले दिन तीन मार्च को धुलंडी यानी रंगों का त्योहार मनाया जाएगा। ज्योतिषियों के अनुसार फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर होलिका पूजन का विशेष महत्व होता है। शास्त्रसम्मत नियमों के अनुसार होलिका दहन भद्रा रहित प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा को करना ही श्रेष्ठ माना गया है।
दो मार्च को पूर्णिमा तिथि शाम 5.56 बजे से प्रारंभ होगी। इसी समय से भद्रा काल भी शुरू हो जाएगा जो अगले दिन सुबह 5.32 बजे तक रहेगा। इस बार प्रदोष काल में होलिका दहन के लिए केवल 12 मिनट का समय उपलब्ध रहेगा। शाम 6.24 बजे से शाम 6.36 बजे के बीच का समय दहन के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा परंपरा के अनुसार मध्यरात्रि 01.23 बजे से 02.34 बजे के बीच भद्रा पुच्छ के दौरान भी होलिका दहन किया जा सकता है।
इस वर्ष रंगों का त्योहार धुलंडी तीन मार्च को खग्रास चंद्र ग्रहण के साये में मनाया जाएगा। यह ग्रहण दोपहर 3.20 बजे शुरू होगा और शाम 6.48 बजे समाप्त होगा। भारत में दिखाई देने के कारण इसका धार्मिक महत्व होगा और इसका सूतक काल ग्रहण शुरू होने से 9 घंटे पहले यानी मंगलवार सुबह 6.20 बजे से ही लागू हो जाएगा। सूतक काल के दौरान मंदिरों के दर्शन और शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं।
धुलंडी के अवसर पर निकलने वाली ऐतिहासिक ‘रावजी की गेर’ इस बार तीन मार्च को निकलेगी। इसको लेकर तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। रावजी की गेर को लेकर माली समाज के लोगों में उत्साह है। पिछले 633 सालों से ये गेर निकाली जा रही है, जो बहुत ही शांतिपूर्वक तरीके से निकाली जाती है। इस बार भी रावजी की गैर मंडावता बेरा मंदिर चौक से पूजा अर्चना कर खोखरिया बेरा पहुंचे। यहां से गैर को साथ लेकर मंडावता चौराहा होते हुए भिंयाली बेरा, गोपी का बेरा होते हुए फतेहबाग आएगी। गेर में एक ओर विशेष परंपरा है, जिसके अनुसार ऐसे युवक को राव बनाया जाता है, जो नवविवाहित हो और अच्छी कद-काठी के साथ-साथ नाचने में भी माहिर हो। मंडावता बेरा के शिव मंदिर से अमूमन दोपहर साढ़े तीन बजे बाद गेर का आगाज होता है। यहां से गेर खोखरिया बेरा जाती है और वहां के लोगों को साथ लेकर भियाली बेरा, गोपी का बेरा के अंदर से फूलबाग नदी होते हुए फतेहबाग संतोकजी के बेरे पर पहुंचती है। यहां आमली बेरा वाले भी मौजूद रहते हैं। आमली बेरा के दो परिवार बारी-बारी से ही राव का चयन करते हैं। लेकिन खास बात यह है, कि खोखरिया बेरा से ही राव का चयन किया जाता है। वे एक युवक को चुनकर उसकी पीठ पर छापा लगाते हैं। राव तय होने के बाद उसका शृंगार किया जाता है। यहां राव चुनने के बाद गेर आमली बेरा होते हुए लाला बेरा, मंडोर रेलवे ओवरब्रिज के नीचे से, भलावता बेरा होते हुए मंडोर चौराहे होते हुए मंडोर गार्डन में प्रवेश करती है। जहां से मंडोर उद्यान में बने राव कुंड पहुंचती है। इसमें आठ बेरों की गेर सम्मिलित होती है। खोखरिया बेरा, बड़ा बेरा, गोपी बेरा, आमली बेरा, फूलबाग बेरा, नागौरी बेरा, मंडोर बेरा, पदाला बेरा आदि की गेर सम्मिलित होती है। राव को चुनने के बाद उसको सही सलामत रूप से मंडोर उद्यान के राव कुंड तक पहुंचाने में सुरक्षा की जिम्मेदारी मंडावता बेरा के लोगों की ही होती है।
हिन्दुस्थान समाचार / सतीश