समर्पण से संरक्षित होती है कला: प्रो. राठौड़
जोधपुर, 22 मई (हि.स.)। लोक जीवन आनन्द की अनुभूति है। जो व्यक्ति इसमें डूबता है वही प्राप्त कर सकता है। ये विचार महाराजा सूरजमल ब्रज विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. मदन सिंह राठौड़ ने जेएनवीयू में थार लोक संस्कृति अध्ययन केन्द्र में परिचर्चा में व्यक्त किए।
प्रो.राठौड़ ने कहा कि हमें विविध वर्णी लोक कलाओं को संरक्षित करने की आवश्यकता है। लोक संस्कृति सामाजिक समरसता उत्पन्न करती है और चुनौती को अवसर में परिवर्तित करती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. पवन कुमार शर्मा ने कहा कि लोक संस्कृति को संरक्षित करना हमारा सामूहिक दायित्व है। इसमें हमारी पीढिय़ों का ज्ञान संचित है। थार का लोक संगीत विशेष पहचान रखता है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि प्रो.रिछपाल सिंह ने कहा कि भारतीय परम्परा में संतों और भक्तों का विशेष महत्व है। उनकी मौखिक वाणी हमें मिलती है उस पर भी अध्ययन करना चाहिए।
आभार व्यक्त करते हुए विधि संकाय के अधिष्ठाता प्रो. सुनील आसोपा ने कहा कि थार लोक संस्कृति अध्ययन केन्द्र विश्वविद्यालय के एक महत्वपूर्ण अध्ययन केन्द्र के रूप में विकसित हो यह सिंडिकेट की मंशा रही है उन्होंने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। स्वागत व संयोजक लोक संस्कृति अध्ययन केन्द्र के निदेशक प्रो. महिपाल सिंह राठौड़ ने व्यक्त किया।
परिचर्चा में प्रो. विकल गुप्ता, प्रो. रामसिंह आढ़ा, राजेन्द्र सिंह लीलिया, प्रो. यादराम मीणा, डॉ. भंवरूराम जयपाल, डॉ. भानाराम गड़ी, डॉ. प्रेम सिंह, डॉ. महेन्द्र सिंह, डॉ. कीर्ति माहेश्वरी, डॉ. फत्ताराम नायक, डॉ. दिनेश राठी, डॉ. सुरेश चौधरी, डॉ. मीनाक्षी बोराणा, डॉ. विजय लक्ष्मी, डॉ. महेन्द्र पुरोहित, डॉ. हितेन्द्र गोयल, डॉ. ललित सिंह झाला, डॉ. विवेक, प्रो. बाबूलाल दायमा, डॉ. गोविन्द सिंह, डॉ. ओम प्रकाश एवं विश्वविद्यालय के शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहें।
हिन्दुस्थान समाचार / सतीश