जवाहर कला केंद्र में चित्रांग कला प्रदर्शनी में कैनवास पर उकेरी यात्रा

 


जयपुर, 16 जनवरी (हि.स.)। शहर के वरिष्ठ कलाकार 70 वर्षीय जगदीश चंद्र ने अपनी सोलो आर्ट एग्जिबिशन चित्रांग में प्रकृति, यात्रा और इतिहास से प्रेरित कृतियों के माध्यम से दर्शकों को एक दृश्यात्मक यात्रा पर ले जाने का प्रयास किया है। आमेर किले की लम्बी दीवारें, दीवान-ए-खास की भव्यता, राधा-कृष्ण के श्रृंगार, बाजीराव-मस्तानी की प्रेम कथा और प्रकृति की मनोहारी छवियाँ उनकी पेंटिंग्स में जीवंत रूप से उभरती हैं। जवाहर कला केंद्र की सुदर्शन आर्ट गैलरी में शुक्रवार को उनकी पाँच दिवसीय कला प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ। प्रदर्शनी में विभिन्न विषयों पर आधारित कुल 25 चित्र प्रदर्शित किए गए हैं।

प्रदर्शनी का उद्घाटन प्रतिष्ठित कला समीक्षक एवं संस्कृतिकर्मी तृप्ति पांडे, सुधीर माथुर, ऋषि मिगलानी, संजय कोठारी सहित अन्य गणमान्यजनों द्वारा किया गया। इस अवसर पर जगदीश चंद्र ने बताया कि उन्हें भ्रमण का विशेष शौक है और उनकी अधिकांश कृतियाँ उनके यात्रा अनुभवों से प्रेरित हैं। किसी चेहरे की मासूमियत स्मृति में रह जाए तो वे उसे कैनवास पर उतार देते हैं, वहीं प्रकृति की खूबसूरती को रंगों की दुनिया में सहेजते हैं। यह प्रदर्शनी 20 जनवरी तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी।

वॉरियर क्लैन्स शीर्षक यह पेंटिंग 17वीं-18वीं शताब्दी के राजस्थान के उस कालखंड को जीवंत करती है, जब वीरता, शौर्य और कला आपस में गहराई से जुड़े हुए थे। इसमें योद्धा कुलों की सामूहिक शक्ति, अनुशासन और रक्षक स्वरूप को दर्शाया गया है। ये योद्धा केवल भूमि के संरक्षक ही नहीं थे, बल्कि संस्कृति और शिल्प परंपराओं के संवाहक भी थे। चित्र साहस के साथ-साथ उस आत्मिक दृढ़ता को भी प्रकट करता है, जो पीढ़ियों तक विरासत बनकर जीवित रहती है।

वॉट वी सीक लाइज़ विदइन आत्मचिंतन और आंतरिक खोज की यात्रा को अभिव्यक्त करती है। बोधगया के बोधि वृक्ष से प्रेरित यह कृति इस विचार को सामने लाती है कि सत्य और उत्तर बाहरी संसार में नहीं, बल्कि हमारे भीतर निहित होते हैं। धुंधले, जल-प्रतिबिंब जैसे रूप मन, आत्मा और चेतना के गहरे संबंध को दर्शाते हैं। यह चित्र दर्शक को ठहरकर स्वयं के भीतर झाँकने और अपने ही प्रतिबिंब में अर्थ खोजने का आमंत्रण देता है।

द प्रोटेक्टर पेंटिंग रणथंभौर की यात्रा के दौरान अनुभव किए गए भावनात्मक क्षणों पर आधारित है। बाघिन का मातृत्व और शावकों की अठखेलियाँ इस कृति में अत्यंत सजीव रूप में उभरती हैं, जो सरिस्का टाइगर रिजर्व की स्मृतियों को भी ताज़ा कर देती हैं। यह पेंटिंग संरक्षण की उस दोहरी प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ कोमलता और शक्ति एक-दूसरे के साथ सहअस्तित्व में रहती हैं।

किंग ऑफ हौरसेज़ यह कृति कल्पना और यथार्थ के संगम से जन्मे एक विचार को प्रस्तुत करती है, यदि घोड़ों का भी कोई राजा हो, तो वह कैसा होगा? चित्र में घोड़े की गरिमा, शांत आत्मविश्वास और स्वाभाविक नेतृत्व को प्रभावशाली ढंग से उकेरा गया है। आभूषणों से सजा यह शाही घोड़ा राजसी ठाठ-बाट और वैभव का प्रतीक बनकर सामने आता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश