भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान : कृषि अवशेष व प्लास्टिक कचरे से टिकाऊ निर्माण में बड़ी पहल

 


आईआईटी जोधपुर ने विकसित की नई तकनीक

जोधपुर, 01 अप्रैल (हि.स.)। सतत (सस्टेनेबल) निर्माण सामग्री के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) जोधपुर ने ऐसी पेटेंट तकनीक विकसित की है, जो कृषि अवशेष और प्लास्टिक कचरे को उच्च गुणवत्ता वाली निर्माण सामग्री में बदलती है। यह नवाचार चक्रीय अर्थव्यवस्था और जलवायु-अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

यह शोध स्कूल ऑफ डिजाइन के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रियब्रत राउत्रय के नेतृत्व में किया गया है, जिसमें दो नई सामग्री बायो-ब्रिक्स और एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स-विकसित की गई हैं। ये नवाचार वैज्ञानिक शोध मटेरियल इंजीनियरिंग और टिकाऊ डिजाइन सिद्धांतों का अनूठा संगम हैं। इस तकनीक का मुख्य आधार एक पेटेंट प्रक्रिया है, जिसमें धान का पुआल, गेहूं का भूसा और गन्ने का बगास जैसे कृषि अवशेषों को कम ऊर्जा वाली चूना आधारित प्रक्रिया से मजबूत निर्माण ईंटों में बदला जाता है। पारंपरिक पकी हुई ईंटों के विपरीत, इन बायो-ब्रिक्स को भट्टों में पकाने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ऊर्जा की बचत होती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है। विशेष रूप से, ये ईंटें कार्बन-नेगेटिव हैं, यानी ये अपने जीवनकाल में उत्सर्जन से अधिक कार्बन को अवशोषित करती हैं।

इसके साथ ही विकसित एग्रो-प्लास्टिक ब्लॉक्स तकनीक मिश्रित प्लास्टिक कचरे और कृषि अवशेषों को मिलाकर टिकाऊ निर्माण सामग्री तैयार करती है। कम ऊर्जा वाली थर्मल फ्यूजन और कंप्रेशन प्रक्रिया के माध्यम से यह तकनीक बिना जटिल रीसाइक्लिंग के विभिन्न प्रकार के प्लास्टिक कचरे का उपयोग संभव बनाती है। इन ब्लॉक्स में बेहतर तापीय और ध्वनि इन्सुलेशन की क्षमता भी पाई गई है।

इन तकनीकों की उपयोगिता को वास्तविक परियोजनाओं के माध्यम से भी सिद्ध किया गया है। देश का पहला बायो-ब्रिक संरचना मॉडल तैयार किया जा चुका है, जबकि आईआईटी जोधपुर परिसर में बायो-ब्रिक आधारित आवास इकाई का निर्माण कार्य जारी है। इस शोध को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिल चुकी है। डॉ. राउत्रय ने बताया कि यह तकनीक केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य मटेरियल इनोवेशन के माध्यम से कार्बन-नेगेटिव और सर्कुलर निर्माण प्रणाली विकसित करना है। राष्ट्रीय और वैश्विक चुनौती का समाधान

गौरतलब है कि भारत वर्तमान में पराली जलाने से होने वाले वायु प्रदूषण और बढ़ते प्लास्टिक कचरे जैसी दोहरी पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में यह नवाचार किफायती और जलवायु-अनुकूल आवास के लिए एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि निरंतर शोध, उद्योग सहयोग और नीतिगत समर्थन के साथ यह तकनीक भविष्य के इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की दिशा बदल सकती है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश