हिन्दुत्व, भारत की आत्मा है- अरुण कुमार

 




अजमेर , 08 अप्रैल(हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अजमेर महानगर द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सूचना केंद्र सभागार में अजमेर के कला साधकों की एक ‘प्रमुख जन गोष्ठी’ का आयोजन किया गया। जिसमें अजमेर में निवास करने वाले कला वर्ग से जाने माने कलाकार एवं प्रमुख जन उपस्थित रहे।

मुख्य वक्ता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अरुण कुमार जैन अखिल भारतीय सह प्रचारक प्रमुख रहे। अरुण जैन ने समाज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रचनात्मक भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंनेे कहा कि संगठन के अभाव, आचरण में धर्म को छोड़ने, पराधीनता के काल में सांस्कृतिक आत्महीनता और स्वार्थ केन्द्रित लालसा के कारण समाज पतन की ओर अग्रसर हुआ एवं पराधीन भी हुआ। अत: व्यक्तिगत एवं राष्ट्रीय चारित्र्य से युक्त समाज के निर्माण के लिये पूजनीय डॉ. हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना की। इस के लिए संगठन और संगठन के लिए शाखा पद्धति विकसित की। प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं ने समाज जीवन में भारत केन्द्रित विचार पर चलने वाले संगठन खड़े किये। पूजनीय गुरुजी ने संघ के वैचारिक अधिष्ठान को पुष्ट किया और कार्यकर्ताओं के लिये प्रेरक नेतृत्व दिया। अपने अलौकिक नेतृत्व से समाज के प्रमुख लोगों से संवाद कर संघ कार्य को आगे बढ़ाया।

उन्होंने कहा कि आपदाओं में संघ कार्यकर्ता सदैव अग्रणी रहे हैं। आपातकाल में अपार कष्ट सहते हुए लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का कार्य संघ ने किया। श्री राम जन्मभूमि आंदोलन और स्वदेशी भाव के जागरण में संघ का कार्य सर्वविदित है। संगठन विस्तार के साथ ही समाज परिवर्तन के विविध कार्य जैसे एकल विद्यालय, एक लाख से अधिक सेवा कार्य समाज के सहयोग से संघ ने किये हैं। संघ कार्य एक राष्ट्रीय आंदोलन है। समाज को संगठित करना संघ का कार्य है। समाज में समाधान ढूँढने का कार्य अपने को करना है, अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करना है।

मुख्य वक्ता ने एकात्म पर बोलते हुए कहा कि भारत में विविधता में एकता है, ऐसा कहा जाता है। किन्तु अपने यहाँ एक से ही अनेक की सृष्टि हुई है। एक की अभिव्यक्ति विविध के रूपों में हुई है। इसलिए कहा जाना चाहिए कि यह ‘एकता में विविधता’ है। वर्ष प्रतिपदा, चातुर्मास एवं मकर संक्रांति जैसे सांस्कृतिक पर्वों का का सम्पूर्ण भारत में विशेष महत्व है। ये एकात्म के प्रतीक है। उन्होंने हिन्दुत्व पर बोलते हुए कहा कि सभी भारतीय पंथ “धर्म मूल्य” में विश्वास रखते है, जो सत्य, करुणा, शुचिता व तपस पर आधारित है। धर्म का अर्थ धार्यते इति धर्म: धारण करने योग्य आचरण से है। मानव कल्याण के लिये धर्म की संकल्पना हिन्दुओं का महानतम योगदान है। इन्हे आचरण में लाने वाले सभी मत-पंथ हिन्दुत्व के घटक हैं। शैव, शाक्त, वैष्णव, कबीरपंथी, जैन, सिख, बौद्ध सहित सभी धाराओं में संवाद, समन्वय एवं एकत्व भाव है।

उन्होंने पंच परिवर्तन सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य, स्व का बोध और पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कुटुंब प्रबोधन की आवश्यकता पर ज़ोर देते हुए कहा कि हर भारतीय परिवार को अपने पूर्वजों की कहानियाँ याद रखनी चाहिए, और नई पीढ़ी में सामाजिक व राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना जगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप और शिवाजी महाराज के साथ मेरा बाई, पन्नाधाय जैसे माताओं को अपने पूर्वजों को देश के महापुरुष सबको प्रातः स्मरणीय मानते हुए, ये सभी हमारे राष्ट्र के प्रेरणास्त्रोत हैं।

कार्यक्रम की शुरुआत आमंत्रित अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। तत्पश्चात मंचासीन अतिथियों ने भारत माता के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। मंचासीन अतिथियों का औपचारिक परिचय एवं स्वागत के बाद संपूर्ण वंदेमातरम के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई।

सुनील दत्त जैन ने कार्यक्रम की प्रस्तावना में बताया कि संघ के शताब्दी वर्ष में संघ ने घर-घर जाकर गृह संपर्क अभियान के माध्यम से संघ कार्य एवं उसकी भूमिका को रखा । उसी क्रम में कलावर्ग के साधकों की यह गोष्ठी आयोजित की गई है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संतोष