स्थानीय निकाय चुनावों में देरी पर गहलोत का हमला, कहा-राजस्थान में संवैधानिक संकट गहराया

 




जयपुर, 08 अप्रैल (हि.स.)। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने राज्य में पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनावों में हो रही देरी को लेकर भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने इसे लोकतंत्र और संविधान के लिए गंभीर खतरा बताया।

गहलोत ने कहा कि प्रदेश में एक वर्ष से अधिक समय से पंचायत और नगर निकाय चुनाव नहीं कराए जाना केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार है। उन्होंने आरोप लगाया कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जगह सरकारी प्रशासकों की नियुक्ति कर जनता के अधिकारों का हनन किया जा रहा है।

उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243यू का हवाला देते हुए कहा कि पंचायतों और नगरीय निकायों का कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है और समय पर चुनाव कराना अनिवार्य है। साथ ही अनुच्छेद 243के के तहत राज्य निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र भूमिका को भी रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव कराना सरकार की इच्छा नहीं, बल्कि संवैधानिक दायित्व है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार परिसीमन, पुनर्गठन और “वन स्टेट-वन इलेक्शन” जैसे बहानों के जरिए चुनाव टाल रही है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय भी इस तरह के कारणों को वैध आधार नहीं मान चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा कई बार निर्देश दिए जाने के बावजूद सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई।

गहलोत के अनुसार, 439 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट द्वारा 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने की समयसीमा तय की गई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा है। इसके बावजूद सरकार की ओर से ठोस कदम नहीं उठाना चिंताजनक है।

उन्होंने कहा कि जब कोई सरकार लगातार संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करे, नागरिकों के मताधिकार को बाधित रखे और न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करे, तो यह स्थिति संवैधानिक विघटन की ओर इशारा करती है।

गहलोत ने 73वें और 74वें संविधान संशोधनों की भावना का उल्लेख करते हुए कहा कि स्थानीय स्वशासन और जनभागीदारी को कमजोर करना लोकतंत्र के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाता है। अंत में उन्होंने चेतावनी दी कि राजस्थान की जनता अपने अधिकारों के हनन को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित