बीएमसीएच में शुरू होगा प्रदेश का पहला लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर

 


जयपुर, 09 अक्टूबर (हि.स.)। गंभीर बीमारी की स्थिति में जब व्यक्ति स्वयं अपने इलाज से जुड़े निर्णय लेने में सक्षम नहीं रह जाता, तब उसकी पहले से व्यक्त चिकित्सा संबंधी इच्छाएं महत्वपूर्ण हो जाती हैं। इसी उद्देश्य से भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल (बीएमसीएच) में प्रदेश का पहला लिविंग विल काउंसलिंग सेंटर शुरू किया जा रहा है। इसकी शुरुआत 10 अक्टूबर को विश्व हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर दिवस पर होगी। केंद्र में लोगों को लिविंग विल के कानूनी और चिकित्सकीय पहलुओं, इसे तैयार करने की प्रक्रिया और आवश्यक औपचारिकताओं की जानकारी दी जाएगी।

अस्पताल प्रबंधन ने इस पहल को लेकर चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की प्रमुख शासन सचिव गायत्री राठौड़ से मुलाकात की। उन्होंने इसे महत्वपूर्ण सामाजिक और मानवीय प्रयास बताते हुए सरकार की ओर से सहयोग का आश्वासन दिया। प्रदेश में लिविंग विल की प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक सरकारी प्रक्रियाओं पर भी चर्चा हुई। इस संबंध में माह के अंत तक अस्पताल प्रबंधन और राज्य सरकार के बीच संयुक्त बैठक प्रस्तावित है।

अस्पताल के अधिशासी निदेशक मेजर जनरल एससी पारीक ने बताया कि केंद्र में पूर्व पंजीकरण के आधार पर सप्ताह में एक दिन काउंसलिंग की सुविधा दी जाएगी। इसका उद्देश्य गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के साथ स्वस्थ व्यक्तियों को भी समय रहते अपनी चिकित्सा संबंधी इच्छाएं स्पष्ट करने के लिए प्रेरित करना है। चिकित्सा निदेशक डॉ. गीतांजलि अग्रवाल जोशी ने बताया कि काउंसलिंग की जिम्मेदारी हॉस्पिस एवं पैलिएटिव केयर विभाग की निदेशक डॉ. अंजुम खान जोड़ संभालेंगी। वे इस क्षेत्र में कार्यरत क्लीनिकों और विशेषज्ञों के संपर्क में हैं, ताकि लोगों को उपलब्ध अनुभव और प्रक्रियाओं के आधार पर उचित मार्गदर्शन मिल सके।

डॉ. अंजुम खान जोड़ के अनुसार, लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जिसके माध्यम से वयस्क व्यक्ति पहले से अपनी यह इच्छा दर्ज कर सकता है कि भविष्य में गंभीर और अपरिवर्तनीय चिकित्सकीय स्थिति में निर्णय लेने या अपनी बात कहने में असमर्थ होने पर वह किस प्रकार का उपचार चाहता है और किन जीवन रक्षक उपायों से बचना चाहता है। इसमें वेंटिलेटर, कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली और अन्य गहन उपचारों को लेकर इच्छाएं दर्ज की जा सकती हैं। इसका उद्देश्य व्यक्ति की स्वायत्तता और गरिमा का सम्मान करना है।

व्यक्ति परिवार के साथ पहले ही इस विषय पर चर्चा कर सकता है कि यदि वह स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में न रहे तो उसके इलाज के बारे में क्या किया जाए और ठीक होने की संभावना नहीं होने पर वह लंबे समय तक जीवन रक्षक प्रणाली पर रहना चाहेगा या नहीं। समय रहते ऐसी बातचीत होने से मरीज की इच्छा स्पष्ट रहती है और परिवार को कठिन फैसलों के मानसिक दबाव से भी राहत मिल सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश