फाल्गुनी लक्खी मेले का समापन, सूरजगढ़ का निशान शिखर पर चढ़ाया
सीकर, 28 फ़रवरी (हि.स.)। विश्व प्रसिद्ध खाटू श्याम मंदिर में आयोजित बाबा श्याम का वार्षिक फाल्गुनी लक्खी मेला भोग आरती और परंपरागत सूरजगढ़ के निशान चढ़ाने की रस्म के साथ विधिवत संपन्न हो गया। आठ दिनों तक चले इस आस्था पर्व में देशभर से लाखों श्रद्धालु खाटूनगरी पहुंचे और बाबा श्याम के दर्शन किए।
हर वर्ष की तरह इस बार भी सूरजगढ़ से 152 किलोमीटर की पदयात्रा कर पवित्र निशान खाटू धाम पहुंचा, जिसे मंदिर परिसर के मुख्य शिखर पर विधि-विधान के साथ चढ़ाया गया। द्वादशी के अवसर पर बाबा श्याम को खीर-चूरमे का भोग अर्पित किया गया और भव्य आरती के साथ मेले का औपचारिक समापन हुआ।
मंदिर कमेटी के अनुसार 21 से 28 फरवरी तक चले मेले में करीब 15 लाख श्रद्धालुओं ने बाबा श्याम के दर्शन किए। पिछले वर्ष 12 दिनों तक चले मेले में लगभग 20 लाख भक्त पहुंचे थे। इस बार मेले की अवधि कम रहने, बोर्ड परीक्षाओं, चंद्रग्रहण और कुछ अफवाहों के कारण श्रद्धालुओं की संख्या में लगभग पांच लाख की कमी आ गई। इसके बावजूद समापन के बाद भी 14 लाइनों में लगकर श्रद्धालु लगातार दर्शन कर रहे हैं और खाटू नगरी में रौनक बरकरार है।
श्रीश्याम मंदिर कमेटी के मंत्री मानवेंद्र सिंह चौहान ने बताया कि तीन मार्च को चंद्रग्रहण के कारण मंदिर के पट पूरे दिन बंद रहेंगे। चार मार्च को सुबह साढ़े पांच बजे मंगला आरती के साथ पट खुलेंगे। वहीं चार मार्च की रात विशेष सेवा पूजा और तिलक श्रृंगार के चलते रात नौ बजे पट बंद कर दिए जाएंगे, जो पांच मार्च की शाम पांच बजे पुनः खोले जाएंगे। चंद्रग्रहण के कारण होली पर खाटू में रुकने वाले श्रद्धालुओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम बताई जा रही है।
मेले के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। पिछले वर्ष की तुलना में अधिक पुलिस जाब्ता तैनात रहा।
जिला प्रशासन और मंदिर कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए टीनशेड, पेयजल, चिकित्सा और अन्य व्यवस्थाएं की गईं। वीआईपी दर्शन व्यवस्था इस बार पूरी तरह बंद रखी गई और वीआईपी लाइन भी आम भक्तों के लिए खोल दी गई। पार्किंग की दूरी, बस हड़ताल और परीक्षाओं का असर भी भीड़ पर देखने को मिला, लेकिन समग्र रूप से मेला शांतिपूर्ण संपन्न हुआ।
खाटू श्याम जी के लाखों भक्त विश्वभर में फैले हैं, लेकिन सूरजगढ़ से निकलने वाला निशान अपनी विशिष्ट आस्था और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण विशेष पहचान रखता है।
जनश्रुति के अनुसार मुगल काल में मंदिर की रक्षा के लिए सूरजगढ़ के ठाकुर सूरजमल सिंह ने अपने साथियों के साथ संघर्ष किया था। इसी तरह अंग्रेजी शासनकाल में भी आस्था की रक्षा के प्रसंगों का उल्लेख मिलता है। तभी से सूरजगढ़ का निशान मंदिर के मुख्य शिखर पर पूरे वर्ष लहराने की परंपरा कायम है, जो भक्ति और बलिदान का प्रतीक मानी जाती है।
फाल्गुनी लक्खी मेले के समापन के बाद भी खाटू नगरी में श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी है और बाबा श्याम के जयकारों से वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित