बढ़ती उम्र का असर समझकर न टालें जोड़ों का दर्द: डॉ. दिलीप मेहता
जयपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। जोड़ों में बार-बार होने वाले दर्द, अकड़न और सूजन को बढ़ती उम्र या सामान्य थकान मानकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। ये लक्षण गठिया सहित जोड़ों से जुड़ी किसी बीमारी के संकेत हो सकते हैं। ऐसे में समय पर चिकित्सकीय परामर्श और उचित उपचार जरूरी है। विश्व आर्थराइटिस दिवस के अवसर पर सोमवार को स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने जोड़ों की सेहत के प्रति जागरूक रहने और शुरुआती लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह दी।
इस वर्ष विश्व आर्थराइटिस दिवस की थीम ‘अपने सपनों को साकार करें’ (अचीव योर ड्रीम्स) है। इसका उद्देश्य रूमेटिक और मस्कुलोस्केलेटल बीमारियों से जूझ रहे लोगों की आकांक्षाओं को सामने लाना और यह संदेश देना है कि समय पर उपचार व उचित सहयोग से सक्रिय जीवन जारी रखने में मदद मिल सकती है।
फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल जयपुर के ऑर्थोपेडिक्स विभाग के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. दिलीप मेहता ने कहा कि जोड़ों के दर्द को केवल बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा नहीं मानना चाहिए। खासकर तब, जब दर्द लगातार बना रहे या रोजमर्रा की गतिविधियों में बाधा डालने लगे। समय पर बीमारी की पहचान और उचित उपचार से जोड़ों की कार्यक्षमता बनाए रखने तथा सक्रिय जीवन जीने में मदद मिल सकती है।
घुटनों, कूल्हों, कंधों, हाथों या अन्य जोड़ों में बार-बार दर्द होना, सुबह उठने या लंबे समय तक निष्क्रिय रहने के बाद अकड़न महसूस होना, जोड़ों के आसपास सूजन या असामान्य गर्माहट रहना और जोड़ों को मोड़ने या हिलाने में कठिनाई होना ऐसे लक्षण हैं, जिन पर ध्यान देना चाहिए। चलते समय, सीढ़ियां चढ़ते हुए या व्यायाम के दौरान दर्द होने के साथ यदि नींद और दैनिक दिनचर्या भी प्रभावित होने लगे, तो चिकित्सक से परामर्श लेना जरूरी है।
गठिया एक व्यापक शब्द है, जिसमें जोड़ों और उनके आसपास के ऊतकों को प्रभावित करने वाली कई बीमारियां शामिल हैं। ऑस्टियोआर्थराइटिस उम्र बढ़ने के साथ अधिक आम होता है, जबकि सूजन संबंधी गठिया युवाओं को भी प्रभावित कर सकता है। पहले लगी चोट, अधिक वजन, बार-बार एक जैसी शारीरिक गतिविधियों से जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव, कुछ ऑटोइम्यून बीमारियां और आनुवंशिक कारण इसके जोखिम को बढ़ा सकते हैं। लक्षणों की प्रकृति व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग हो सकती है, इसलिए सही चिकित्सकीय जांच महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ वजन बनाए रखने से घुटनों और कूल्हों जैसे शरीर का भार सहने वाले जोड़ों पर दबाव कम किया जा सकता है। अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करना, जोड़ों के आसपास की मांसपेशियों को मजबूत बनाना और लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने या खड़े रहने से बचना उपयोगी है। लगातार बने रहने वाले या बढ़ते दर्द, अकड़न और सूजन को नजरअंदाज करने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। उपचार, व्यायाम और पुनर्वास से जुड़ी चिकित्सकीय सलाह का पालन करना भी जरूरी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश