मानव शरीर का प्राकृतिक प्रोटीन खतरनाक बैक्टीरियल बायोफिल्म को रोकने में सक्षम

 


जोधपुर, 23 फरवरी (हि.स.)। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी जोधपुर (आईआईटी जोधपुर) के शोधकर्ताओं ने चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले एक प्रोटीन की पहचान की है, जो खतरनाक और अत्यधिक प्रतिरोधी बैक्टीरियल बायोफिल्म के निर्माण को रोक सकता है।

बायोफिल्म लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है। यह महत्वपूर्ण शोध विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस), अमेरिका में प्रकाशित हुआ है।

सामान्यत: बैक्टीरिया को अकेली कोशिकाओं के रूप में समझा जाता है, लेकिन वास्तव में कई बैक्टीरिया आपस में जुडक़र एक मजबूत संरचना बना लेते हैं, जिसे बायोफिल्म कहा जाता है। यह एक प्रकार की सूक्ष्म सुरक्षा ढाल होती है, जो प्रोटीन, शर्करा और डीएनए से मिलकर बनती है। बायोफिल्म में मौजूद बैक्टीरिया सामान्य बैक्टीरिया की तुलना में लगभग एक हजार गुना अधिक एंटीबायोटिक प्रतिरोधी हो सकते हैं। यह बायोफिल्म कैथेटर, कृत्रिम हृदय वाल्व, हड्डी के इम्प्लांट और पुराने न भरने वाले घावों में आमतौर पर पाई जाती है।

आईआईटी जोधपुर की टीम ने पाया कि ईशरीशिया कोलाई बैक्टीरिया में बायोफिल्म बनने के लिए कर्ली नामक एक विशेष प्रोटीन आवश्यक होता है, जो बैक्टीरिया को सतह से चिपकाने और आपस में जोडऩे का काम करता है। शोध में यह सामने आया कि मानव शरीर में पाया जाने वाला बीटा-टू माइक्रोग्लोब्यूलिन नामक प्रोटीन कर्ली के बनने की शुरुआती प्रक्रिया को ही रोक देता है। इससे बायोफिल्म बन ही नहीं पाती।

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रोटीन बैक्टीरिया को मारता नहीं है, बल्कि उनकी सुरक्षा संरचना को बनने से रोकता है। इस शोध की खास बात यह है कि यह पारंपरिक एंटीबायोटिक की तरह बैक्टीरिया को सीधे नष्ट नहीं करता, बल्कि उनकी सुरक्षा ढाल को कमजोर करता है। इससे बैक्टीरिया में प्रतिरोध विकसित होने की संभावना काफी कम हो जाती है। यह अध्ययन संक्रमण के इलाज के लिए एक नया और टिकाऊ रास्ता दिखाता है तथा घाव भरने की चिकित्सा में भी उपयोगी साबित हो सकता है।

इस शोध की प्रमुख वैज्ञानिक एवं संबंधित लेखिका बायोसाइंस एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नेहा जैन ने बताया कि बायोफिल्म लंबे समय तक चलने वाले संक्रमणों के इलाज में सबसे बड़ी चुनौती है। यह बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक और हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली से बचाती है। उन्होंने कहा कि बीटा-टू माइक्रोग्लोब्यूलिन कर्ली के निर्माण को रोककर बायोफिल्म बनने से रोक सकता है, जिससे प्रतिरोध का खतरा कम होता है और शरीर की प्राकृतिक जैविक प्रणाली पर आधारित नई चिकित्सा विकसित करने का मार्ग प्रशस्त होता है।

एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस आज पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बन चुका है। यह शोध बैक्टीरिया को मारने के बजाय उनकी सुरक्षा ढाल को तोडऩे की रणनीति प्रस्तुत करता है। मानव शरीर में पहले से मौजूद अणुओं के उपयोग से सुरक्षित और दीर्घकालिक उपचार विकसित करने की दिशा में यह एक अहम कदम माना जा रहा है। आईआईटी जोधपुर का यह अग्रणी शोध दर्शाता है कि भारत में हो रहा अत्याधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान वैश्विक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हिन्दुस्थान समाचार / सतीश