सुखद : वन्यजीव गणना के दौरान दिखे तीस से अधिक काले हिरण

 


धौलपुर, 03 मई (हि.स.)। राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य धौलपुर के अंतर्गत नाका समोना क्षेत्र में हाल ही में आयोजित वन्यजीव गणना के दौरान तीस से अधिक ब्लैकबक (काला हिरण) देखे गए हैं। राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य में काले हिरणों की मौजूदगी से आने वाले दिनों में पर्यटन में बढोतरी होगी,जो काफी सुखद माना जा रहा है।

राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य धौलपुर के डीएफओ डॉ. आशीष व्यास ने बताया कि काला हिरण घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र की एक महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील प्रजाति है, जिसकी उपस्थिति क्षेत्र की स्वस्थ पारिस्थितिकी का संकेत देती है। वन विभाग द्वारा अभयारण्य क्षेत्र में नियमित गश्त, अवैध शिकार पर नियंत्रण, आवास संरक्षण, जल स्रोतों का विकास तथा स्थानीय समुदाय के सहयोग से वन्यजीव संरक्षण के प्रभावी प्रयास किए जा रहे हैं। इन सतत प्रयासों के परिणामस्वरूप काला हिरण जैसी संवेदनशील प्रजातियों की पुनः उपस्थिति एवं संरक्षण संभव हो पाया है। उन्होंने बताया कि काला हिरण मध्यम आकार का अत्यंत आकर्षक मृग है, जिसमें स्पष्ट लैंगिक भिन्नता पाई जाती है। वयस्क नर का रंग गहरे भूरे से काले तक होता है तथा इसके सर्पिल सींग होते हैं, जबकि मादा हल्के पीले-भूरे रंग की होती है और सामान्यतः बिना सींग की होती है। यह प्रजाति मुख्यतः घासभूमि, झाड़ीदार एवं अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में पाई जाती है तथा खुले मैदानों को अधिक पसंद करती है। यह एक दिवाचर एवं शाकाहारी प्रजाति है, जो मुख्यतः घास एवं कोमल वनस्पतियों पर निर्भर रहती है। काला हिरण सामान्यतः समूहों में रहता है, जिनका आकार मौसम एवं भोजन की उपलब्धता के अनुसार बदलता रहता है। ऐतिहासिक रूप से काला हिरण राजस्थान में व्यापक रूप से पाया जाता था, किन्तु वर्तमान में यह सीमित एवं खंडित आवासों में ही देखा जाता है। हालांकि, संरक्षण प्रयासों के कारण कुछ क्षेत्रों में इसकी संख्या में वृद्धि भी दर्ज की गई है। डॉ. व्यास ने बताया कि धौलपुर क्षेत्र एवं राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य में काला हिरण के अतिरिक्त नीलगाय, चीतल, सांभर, चौसिंगा एवं चिंकारा जैसे अन्य मृग भी पाए जाते हैं, जो इस क्षेत्र की जैव विविधता को समृद्ध बनाते हैं।

डॉ. व्यास ने बताया कि वन्यजीव गणना के दौरान वन विभाग के कार्मिकों द्वारा यह अवलोकन न केवल अभयारण्य की पारिस्थितिक गुणवत्ता को दर्शाता है, बल्कि यह भी इंगित करता है कि उचित संरक्षण एवं प्रबंधन से दुर्लभ प्रजातियों की वापसी संभव है। वन विभाग भविष्य में भी ऐसे संरक्षण प्रयासों को निरंतर जारी रखेगा।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / प्रदीप