देवउठनी एकादशी से गूंजेंगी शहनाइयां: चार माह बाद शुरू होगा विवाह सीजन
जयपुर, 31 अक्टूबर (हि.स.)। चार माह के चातुर्मास के बाद बीस नवंबर को देवउठनी एकादशी से विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्यों पर लगा विराम हट जाएगा। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने के साथ ही विवाह सीजन शुरू होगा। इस दिन अबूझ मुहूर्त होने से विवाह के लिए अलग से लग्न-मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं होती। इसके बाद 14 दिसंबर को खरमास शुरू होने तक करीब 24 दिन विवाह के कई शुभ मुहूर्त रहेंगे। चार महीने से शुभ तिथियों का इंतजार कर रहे परिवारों में अब शादी की तैयारियां तेज होने लगी हैं।
पंडित राजेश कुमार शर्मा ने बताया कि सनातन परंपरा में देवउठनी एकादशी का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। इस दौरान विवाह सहित कई मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु के जागने के साथ चातुर्मास समाप्त होता है और शुभ कार्यों की शुरुआत होती है।
पंडित शर्मा के अनुसार ज्योतिषीय मान्यताओं में देवउठनी एकादशी को अबूझ मुहूर्त माना गया है। इस दिन विवाह के लिए अलग से शुभ लग्न, नक्षत्र, चंद्रमा और ग्रहों की स्थिति देखने की जरूरत नहीं होती। मेष से लेकर मीन तक सभी 12 राशियों के जातकों के लिए यह दिन शुभ माना गया है। ऐसे में जिन परिवारों को विवाह के लिए उपयुक्त मुहूर्त मिलने में परेशानी हो रही है, वे इस दिन विवाह संपन्न करा सकते हैं।
देवउठनी एकादशी पर तुलसी विवाह की भी परंपरा है। इस दिन भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विधि-विधान से विवाह कराया जाता है। घरों और मंदिरों में तुलसी के पौधे को सजाकर विवाह की रस्में निभाई जाती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार तुलसी विवाह को कन्यादान के समान पुण्यदायी माना गया है। कई परिवार इस आयोजन के साथ ही अपने घरों में विवाह संबंधी मांगलिक कार्यक्रमों की शुरुआत करते हैं।
देवउठनी एकादशी के बाद कार्तिक, अगहन, पौष, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख और ज्येष्ठ माह में अलग-अलग तिथियों पर विवाह के योग बनते हैं। पंचांग की गणना के अनुसार विवाह के लिए 20 से अधिक शुभ मुहूर्त उपलब्ध हो सकते हैं। अलग-अलग वर्षों में ग्रहों और पंचांग की गणना के अनुसार इनकी संख्या 25 से 30 या इससे अधिक भी हो सकती है।
पंडित शर्मा ने बताया कि विवाह के मुहूर्त तय करते समय खरमास का भी ध्यान रखा जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में विवाह सहित मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इस बार 14 दिसंबर से खरमास शुरू होगा और करीब एक माह तक विवाह आयोजनों पर फिर विराम रहेगा। 'खर' शब्द का संबंध जड़ता अथवा मंदता से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि इस अवधि में विवाह जैसे महत्वपूर्ण संस्कार करने से बचना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश