विकृत इतिहास को सुधारना समय की आवश्यकता - डॉ. पांडे

 


उदयपुर, 27 मार्च (हि.स.)। भारत की ज्ञान परंपरा, संघर्ष क्षमता, धर्म और महापुरुषों के प्रति स्वाभिमान को कमजोर करने के प्रयास इतिहास लेखन के माध्यम से किए गए, किंतु भारतीय समाज ने कभी दासता को हृदय से स्वीकार नहीं किया। इतिहास में केवल उन युद्धों को प्रमुखता दी गई, जिनमें सत्ता परिवर्तन हुआ, जबकि भारतीयों द्वारा लड़े गए कई विजयी संघर्षों और बलिदानों को पर्याप्त स्थान नहीं मिल सका।

उक्त विचार अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना, नई दिल्ली के राष्ट्रीय संगठन मंत्री डॉ. बालमुकुंद पांडे ने व्यक्त किए। वे यहां राजस्थान विद्यापीठएवं भारतीय इतिहास संकलन समिति, उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को राजस्थान दिवस कार्यक्रमों के कड़ी में आयोजित राजपूताना से राजस्थान विषयक विचार गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि विकृत इतिहास को पुनः सुसंगठित और त्रुटिरहित करने की आवश्यकता है, ताकि समाज अपने वास्तविक अतीत से परिचित हो सके। भारतीय समाज ने कभी अन्याय को स्वीकार नहीं किया, बल्कि परिस्थितियों में केवल आवश्यक समझौते किए हैं। भारत का इतिहास कण-कण में विद्यमान है, आवश्यकता उसे समग्र रूप से समझकर सही रूप में प्रस्तुत करने की है।

पांडे ने कहा कि जातीय और वर्ग विभाजन के माध्यम से समाज में दूरी पैदा की गई, जिसे समाप्त कर सभी को भारत माता की संतानों के रूप में एकजुट होकर कार्य करना होगा। इतिहास शुष्क विषय नहीं, अपितु मानव मन और समाज की चेतना से जुड़ा विज्ञान है। उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान सदैव संघर्ष, नारी सम्मान और स्वाभिमान का प्रतीक रहा है। इसकी परंपराएँ पूरे देश और विश्व को स्वाभिमान का संदेश देती हैं।

अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने कहा कि इतिहास केवल तिथियों और युद्धों का विवरण नहीं, बल्कि समाज की जीवंत चेतना का प्रतिबिंब होता है। महाराणा प्रताप का जीवन कठिन परिस्थितियों में भी स्वाभिमान से समझौता न करने की परंपरा का परिचायक रहा, यही राजपूताना की पहचान भी रही है। मेवाड़ में एकलिंगजी को राज्य का वास्तविक स्वामी मानकर शासक स्वयं को “दीवान” कहते थे, जो सत्ता नहीं बल्कि सेवा और उत्तरदायित्व की भावना को दर्शाता है। राजपूताना की परंपरा में लोकतंत्र की जड़ें निहित हैं।

मुख्य वक्ता इग्नू नई दिल्ली के इतिहास विभाग के प्रोफेसर तथा अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के राष्ट्रीय मंत्री प्रो. शिव कुमार मिश्रा ने कहा कि राजस्थान के इतिहास को समझने के लिए प्राचीन काल से चली आ रही एकीकरण की प्रक्रिया तथा बाहरी आक्रमणों के विरुद्ध संघर्षों को समग्र रूप से देखना आवश्यक है। उन्होंने बसंतगढ़ से प्राप्त अभिलेखीय प्रमाणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस क्षेत्र में शैलचित्र काल से लेकर वैदिक युग तक समृद्ध सभ्यता, विकसित नगरीय व्यवस्था और गणतांत्रिक परंपराएँ विद्यमान रही हैं। चैहान शासकों के विस्तार, महाराणा सांगा के नेतृत्व में लड़े गए युद्धों तथा मुगलों के विरुद्ध प्रतिरोध को उन्होंने इस ऐतिहासिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।

प्रो. मिश्रा ने महाराणा प्रताप के संघर्ष और मेवाड़ की अस्मिता को विशेष रूप से रेखांकित किया। राजस्थान के निर्माण पर उन्होंने कहा कि यह एक चरणबद्ध प्रक्रिया थी, जिसमें बीकानेर की प्रथम संधि, जोधपुर, धौलपुर और जैसलमेर के विलय तथा मेवाड़ शासकों के समर्पण जैसे महत्वपूर्ण पड़ाव शामिल हैं। उन्होंने अंत में कहा कि राजस्थान का निर्माण केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जनसहभागिता, सांस्कृतिक निरंतरता और ऐतिहासिक चेतना का परिणाम है।

इससे पूर्व, आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए सुखाड़िया विश्वविद्यालय के डॉ. मनीष श्रीमाली ने कहा कि राजपूताना से राजस्थान की यात्रा में चित्तौड़ सदैव सभी के लिए राष्ट्रीय तीर्थ के रूप में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है,केसरिया और जौहर की ऊर्जा सभी को ऊर्जावान रखती है। राजस्थान के मध्यकाल के संघर्ष और उसके बाद की एकीकरण की प्रक्रिया और राजपूतों से राजस्थान बनाने की कड़ी में पहली आहुति मेवाड़ से दी गई। प्रारंभ में प्राचार्य प्रो. सरेाज गर्ग ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की जानकारी दी। समारोह में अतिथियों द्वारा डॉ. प्रियंका कोठारी, डॉ. पोवेल भारद्वाल द्वारा लिखित पुस्तक फोरेंसिक इनसाइट्स विमोचन किया गया।

इस अवसर पर इतिहास संकलन समिति के महानगर अध्यक्ष डॉ. महामाया प्रसाद चैबीसा, महानगर मंत्री दीपक शर्मा, जिला मंत्री चेनशंकर दशोरा, प्रांत महासचिव डॉ. विवेक भटनागर, डाॅ. मनीष श्रीमाली, गौरी शंकर दवे, प्रो. दिग्विजय भटनागर, रमेश शुक्ला, प्रो. सरोज गर्ग, प्रो. बलिदान जैन, प्रो. अमी राठौड, प्रो. रचना राठौड, प्रो. भूरा लाल श्रीमाली, सहित इतिहासविद, अकादमिक व गैर अकादमिक कार्यकर्ता, शोधार्थी, इतिहास में रुचि रखने वाले गणमान्य उपस्थिति थे। संचालन डॉ. हरीश चैबीसा ने किया जबकि आभार डॉ. रचना राठौड ने जताया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता