बीकानेर नगर निगम में कांग्रेस का बहुमत, अब मेयर पद के लिए गुटीय समीकरणों की परीक्षा

 




बीकानेर, 14 सितंबर (हि.स.)। बीकानेर नगर निगम के चुनाव परिणामों में कांग्रेस ने 42 वार्डों में जीत दर्ज कर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है। 80 सदस्यीय निगम में बहुमत के लिए जरूरी 41 सीटों से एक अधिक जीत के साथ कांग्रेस ने बोर्ड गठन का रास्ता साफ कर दिया है। भाजपा को 27, निर्दलीयों को 10 और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) को एक सीट मिली है। अब निगम में कांग्रेस का बोर्ड बनना तय माना जा रहा है, लेकिन अगली चुनौती मेयर पद के लिए उपयुक्त चेहरे के चयन की होगी।

चुनाव परिणामों में कांग्रेस को भाजपा से 15 सीटों की बढ़त मिली है। वहीं निर्दलीय प्रत्याशियों ने भी दस वार्डों में जीत दर्ज कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वार्ड 23 में रालोपा की सरोज की जीत हुई है। हालांकि कांग्रेस के पास अपने दम पर बहुमत है, लेकिन मेयर पद के चुनाव में पार्टी के भीतर दावेदारों के बीच संतुलन बनाना नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण होगा।

बीकानेर नगर निगम के 80 वार्डों के लिए कुल 373 प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे। प्रत्याशियों की संख्या के लिहाज से यह चुनाव काफी प्रतिस्पर्धी रहा। परिणामों ने जहां कांग्रेस के संगठनात्मक प्रदर्शन को मजबूती दी है, वहीं भाजपा के लिए निगम में विपक्ष की भूमिका निभाने की चुनौती सामने आई है।

चुनाव परिणामों में कई प्रमुख चेहरों की हार और जीत ने मेयर पद की संभावित दावेदारी को प्रभावित किया है। वार्ड 73 में कांग्रेस के अनिल कल्ला ने भाजपा के दीपक पारीक को करीब 800 मतों के अंतर से पराजित किया। अनिल कल्ला कांग्रेस नेता डॉ. बी.डी. कल्ला के भतीजे हैं और उन्हें मेयर पद के संभावित दावेदारों में माना जा रहा है। उनकी जीत से कांग्रेस के भीतर मेयर पद की दावेदारी को लेकर चर्चा तेज हो सकती है।

दूसरी ओर, पूर्व मेयर सुशीला कंवर राजपुरोहित को वार्ड में कांग्रेस की किरण भाटी के हाथों हार का सामना करना पड़ा। सुशीला कंवर पिछले चुनाव में मेयर बनी थीं और इस बार भाजपा के निकाय चुनाव घोषणा पत्र से जुड़ी समिति की सदस्य भी थीं। उनका चुनाव हारना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक झटका माना जा सकता है। साथ ही, इससे मेयर पद के लिए पहले से चर्चित चेहरों के समीकरण भी प्रभावित हुए हैं।

कांग्रेस के पास बहुमत होने के कारण बोर्ड गठन के लिए उसे निर्दलीयों या अन्य दलों के समर्थन पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मेयर पद का चयन केवल संख्याबल का विषय नहीं होगा। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के समर्थक दावेदारों के सामने आने से नेतृत्व के लिए सर्वसम्मति बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

कांग्रेस में मेयर पद के लिए कई नामों की चर्चा है और इनमें से अधिकांश अलग-अलग राजनीतिक गुटों से जुड़े बताए जाते हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक समीकरण, संगठन के भीतर संतुलन और पार्षदों की स्वीकार्यता जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा। बहुमत हासिल करने के बाद अब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह मेयर पद के लिए किस चेहरे को चुनती है और संभावित दावेदारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजीव