बछ बारस पर गूंजे मंगल गीत: गाय-बछड़े की पूजा कर महिलाओं ने मांगी संतान की लंबी उम्र
जयपुर, 08 सितंबर (हि.स.)। राजधानी जयपुर में मंगलवार को भाद्रपद कृष्ण द्वादशी के अवसर पर गोवत्स द्वादशी यानी बछ बारस का पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। शहर के गली-मोहल्लों से लेकर विभिन्न गौशालाओं और सार्वजनिक स्थलों तक गाय-बछड़े की पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने व्रत रखकर अपने पुत्र की लंबी आयु, संतान की खुशहाली और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। सुबह से ही विभिन्न स्थानों पर महिलाओं के सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करने और बछ बारस की कथा सुनने का सिलसिला चला।
पंडित राजेश कुमार शर्मा ने बताया कि पर्व की परंपरा के अनुसार महिलाओं ने बछड़े वाली गाय का पूजन किया। गाय के खुरों में पानी डालकर उसे चुनरी ओढ़ाई गई और सींगों पर मोली बांधी गई। इसके बाद रोली-तिलक लगाकर गाय-बछड़े की पूजा की गई। महिलाओं ने रातभर भिगोए गए मूंग, मोठ और चने तथा मक्का की रोटी का भोग लगाया और गाय-बछड़े को हरा चारा, दलिया आदि खिलाया। पूजा के बाद गाय और बछड़े की परिक्रमा कर संतान के लिए मंगल कामना की गई। कई महिलाओं ने श्रद्धापूर्वक गाय की पूंछ अपने सिर से लगाकर आशीर्वाद लिया।
शहर के कई घरों और मोहल्लों में महिलाओं ने लकड़ी के पाटे पर गीली मिट्टी से गाय-बछड़ा तथा बाघ-बाघिन की आकृतियां बनाकर उनकी पूजा की। महिलाओं ने विधि-विधान से कथा सुनी और लोक परंपरा के अनुसार पर्व मनाया। महिला मंडलों की ओर से बछ बारस से जुड़े पदों और भजनों का गायन भी किया गया। कई स्थानों पर महिलाएं सामूहिक रूप से एकत्रित हुईं और पूजा के बाद कथा श्रवण किया।
बछ बारस के अवसर पर शहर के कई मंदिरों में भी विशेष सजावट की गई। ठाकुरजी को नवीन पोशाक धारण करवाई गई। मंदिरों के गर्भगृह को वन-उपवन का स्वरूप देने के लिए पेड़-पौधे, पत्तियां और घास से सजाया गया। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालुओं ने दर्शन किए।
बछ बारस पर खान-पान को लेकर भी विशेष परंपराओं का पालन किया गया। महिलाओं ने गेहूं की चपाती से परहेज करते हुए मक्का, चना, मूंग और मोठ से बने खाद्य पदार्थों का सेवन किया। कई घरों में मक्का की रोटी बनाई गई। महिलाओं ने गाय के दूध और उससे बनी वस्तुओं का सेवन भी नहीं किया। कुछ परिवारों में भैंस या बकरी के दूध का उपयोग किया गया।
पर्व की मान्यता के अनुसार भोजन तैयार करने में भी विशेष सावधानी रखी गई। कई घरों में सब्जियां चाकू से काटे बिना बनाई गईं अथवा ऐसी सब्जियां तैयार की गई, जिन्हें काटने की आवश्यकता नहीं होती। महिलाओं ने चाकू से कटे फलों का भी त्याग किया। अंकुरित अनाज से तैयार पारंपरिक व्यंजन भी भोजन का हिस्सा रहे। व्रत खोलते समय कई महिलाओं ने बाजरे की रोटी और दही का सेवन किया।
शहर में जगह-जगह लोगों ने सार्वजनिक स्थलों पर मौजूद गायों को हरा चारा खिलाकर पर्व मनाया। बड़ी संख्या में महिलाएं और श्रद्धालु गौशालाओं में पहुंचे और बछड़े वाली गाय का पूजन किया। मान्यता के अनुसार गाय और बछड़े की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति और संतान के जीवन में मंगल बना रहता है।
शाम को गायों के लौटने से पहले भोजन करने की परंपरा के चलते महिलाओं ने दिनभर व्रत और निर्धारित खान-पान के नियमों का पालन किया। बछ बारस के मौके पर जयपुर में धार्मिक आस्था के साथ राजस्थान की लोक संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिली।
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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश