दुर्ग पर दो बार आई थी आशा भोसले, लाइट एंड साउंड शो देखने के लिए किया था इंतजार, 52 साल पहले मीरा मंदिर में भी गाए थे भजन

 


चित्तौड़गढ़, 12 अप्रैल (हि.स.)। मशहूर सिंगर आशा भोंसले के निधन से स्वर प्रेमियों को झकझोर कर रख दिया। जैसे ही उनके निधन की सूचना मिली तो कई लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। आशा भोसले की चित्तौड़गढ़ से भी यादें जुड़ी रही है। उनके चित्तौड़ दुर्ग पर दो बार आने की जानकारी सामने आई है। वर्ष 2012 में भी वह चित्तौड़ दुर्ग पर आई थी तब उन्होंने लाइट एंड साउंड शो देखा था। लेकिन पद्मिनी महल नहीं घूमने का उन्हें मलाल रह गया। वहीं करीब 52 साल पहले भी सिंगर आशा भोसले चित्तौड़ दुर्ग पर आई थी तब उन्होंने दुर्ग स्थित मीरा मंदिर में भजन गाए थे। वहीं दुर्ग के स्थानीय निवासी की मदद से दुर्ग का भ्रमण किया था। इस दौरान आशा भोसले ने काफी समय दुर्ग पर बिताया था।

राजस्थान टूरिस्ट डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (आरटीडीसी) की चित्तौड़गढ़ स्थित होटल पन्ना के मैनेजर रविंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि दिसंबर 2012 में आशा भोसले अपनी बहनों उषा भोंसले व एक अन्य बहन तथा भांजी के साथ चित्तौड़ दुर्ग पर आई थी चार-पांच गाड़ियों के काफिले के साथ पूरा परिवार उदयपुर से चित्तौड़गढ़ दुर्ग आया और कालिका माता मंदिर दर्शन किए थे। यह सभी शाम को चित्तौड़ दुर्ग पर पहुंचे थे। इस दौरान सर्दी का मौसम होने के कारण अंधेरा हो गया था। उन्हें कुम्भामहल में स्थित लाइट एंड साउंड शो को देखना था। आशा भोसले समय से ही पहले वह कुम्भामहल में आ गई और परिवार के साथ काफी देर तक बेंच पर बैठी। बाद में उन्होंने परिवार के साथ लाइट एंड साउंड शो देखा था। मैनेजर रविंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि उनका यह दुर्ग भ्रमण का कार्यक्रम पूरी तरह से निजी था और कैमरों की चकाचौंध से भी दूर था। उसे समय यह दौरा मीडिया की सुर्खियों में भी नहीं आया और ना ही कोई फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। ऐसे में लोगों को पता ही नहीं था कि आशा भोंसले दिसंबर 2012 में चित्तौड़ दुर्ग पर आई थी। उनके मन में पद्मिनी महल भ्रमण का भी था लेकिन अंधेरा होने के कारण वे जा नहीं पाए थे।

रात को विशाल दुर्ग देख कर हुई थी अभिभूत

चतुर्वेदी ने बताया कि उन्होंने लाइट एंड साउंड शो देख कर इसकी काफी सराहना की थी। वहीं उन्होंने पहली बार रात्रि के समय चित्तौड़ दुर्ग देखा था। ऐसे में इन्होंने दुर्ग को देख कर अभिभूत हुई और कहा कि यह हमारी बहुत बड़ी विरासत है। इस दौरान उन्होंने सर्दी के मौसम में डिस्पोजल में चाय भी पी थी।

व्यू पॉइंट पर पहचाना, पहले समझे लता दीदी है

चित्तौड़ दुर्ग के आखिरी किलेदार परिवार के जयप्रकाश भटनागर ने बताया कि 1974 में पहली बार आशा भोसले चित्तौड़ दुर्ग पर आई थी। आज इनके निधन के समाचार से धक्का लगा है। उनसे 1974 में दुर्ग पर पहली बार परिचय हुआ था। वे दुर्ग पर आई तो किसी को पता नहीं था। किसी को बिना सूचना के उन्होंने चित्तौड़ भ्रमण किया। भटनागर ने बताया कि अक्टूबर 1974 में सुबह की 9 बजे गुनगुनी धूप में दुर्ग स्थित अपने घर के बाहर खड़ा था। तब पर्यटक काफी कम आते थे। एक बड़ी सी गाड़ी सामने से गुजरी, जिसमें काफी लोग बैठे थे। इनके एक शक्ल जानी पहचानी लगी। जब गाड़ी व्यू प्वाइंट पर रुकी तो ड्राइवर से पूछा कि लता दीदी है क्या, तो उसने मना कर दिया। जब बहुत बार पूछा तो बताया कि यह तो आशा भोसले हैं। साथ में उषा मंगेशकर पायलट हेमंत भोसले वह एक दो अन्य लोग भी थे। भटनागर ने बताया कि उन्होंने आशा भोसले को परिचय दिया कि हम गाने के शौकीन हैं व एक रेडियो श्रोता संघ भी है। धीरे-धीरे बातों का सिलसिला बढा व दुर्ग भ्रमण कराने को कहा तो हां कर दी। आशा भोसले ने मीरा मंदिर में काफी देर तक भजन गाए और वहां पर बैठे। यहां बातचीत में उन्होंने पुराने 10-20 कलाकारों के नाम लेते हुए बताया इन सब में मुझे देवानंद बहुत अच्छे लगते हैं।

दाल-बाटी, चूरमें का भी लिया था स्वाद

दुर्ग घूमते हुए आशा भोसले से लंच का पूछा तो पहले मना किया। जब दुर्ग घूम लिए घूम लिए तो घर पर खाना बनवाने की कही। दाल-बाटी चूरमा उनकी पसंद थी तो कहा नहीं घर पर नहीं खाएंगे। बातें करते हुए दुर्ग से नीचे उतर पाडनपोल के यहां फिर कहा यहां खिला देते हैं, तो वे तैयार हो गई। जब दाल-बाटी बन रही थी इसी बीच एक इमली के पेड़ से कुछ पत्तियां तोड़ कर फूंक मार के साफ की और वह खाने लगी। भटनागर ने बताया कि इस दौरान उनसे एक ही निवेदन किया था कि किसी भी तरह 'लताजी' से मिलवा दें। बाद में दो-तीन बार मुंबई भी गया जबकि यहां से जाना काफी कठिन था। तीसरी बार में उन्होंने फिर लताजी के घर पैदल पहुंच कर उनसे मिलवाया और काफी समय देकर उनसे बातचीत हुई थी।

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हिन्दुस्थान समाचार / अखिल