पद्मश्री सम्मान के बाद जैसलमेर पहुंचे अलगोजा वादक तगाराम भील

 


जैसलमेर, 27 मई (हि.स.)। लोक वाद्ययंत्र अलगोजा को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाले जैसलमेर के प्रसिद्ध लोक कलाकार तगाराम भील के पद्मश्री सम्मान के बाद पहली बार अपने गृह जिले पहुंचने पर भव्य स्वागत किया गया। बुधवार को जैसलमेर रेलवे स्टेशन पहुंचते ही लोगों ने ढोल-नगाड़ों, पुष्प वर्षा और जयघोष के साथ उनका अभिनंदन किया।

हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने तगाराम भील को कला क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान और राजस्थान की पारंपरिक लोक संस्कृति को वैश्विक मंच तक पहुंचाने के लिए पद्मश्री सम्मान से नवाजा था। इस उपलब्धि से पूरे जैसलमेर में खुशी और गर्व का माहौल है।

जैसलमेर पहुंचने के बाद तगाराम भील को खुली जीप में बैठाकर शहर में भव्य स्वागत यात्रा निकाली गई। यह यात्रा अंबेडकर उद्यान से शुरू होकर मुख्य मार्गों से होती हुई हनुमान चौराहे तक पहुंची। पूरे रास्ते लोगों ने जगह-जगह फूल बरसाकर उनका स्वागत किया।

स्वागत यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, कलाकार, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और युवा मौजूद रहे। कई स्थानों पर लोगों ने पारंपरिक लोक संगीत और नृत्य के जरिए भी खुशी जाहिर की। अभिनंदन समारोह के दौरान तगाराम भील ने भावुक होते हुए कहा कि यह सम्मान केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि पूरे जैसलमेर, राजस्थान और लोक कला से जुड़े हर कलाकार का सम्मान है। उन्होंने कहा कि रेगिस्तान की मिट्टी और यहां की लोकधुनों ने ही उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।

उन्होंने युवाओं से लोक संस्कृति और पारंपरिक कला को बचाए रखने की अपील करते हुए कहा कि लोक संगीत हमारी पहचान और विरासत है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना जरूरी है।

जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव में 17 अप्रैल 1960 को जन्मे तगाराम भील ने बेहद साधारण परिवेश में लोक संगीत की यात्रा शुरू की थी। महज सात वर्ष की उम्र में मवेशी चराते समय उन्होंने अपने पिता से अलगोजा बजाना सीखा। शीशम और कैर की लकड़ी से बने इस पारंपरिक वाद्य यंत्र पर उन्होंने वर्षों की साधना से महारत हासिल की। उनका कला सफर वर्ष 1981 में जैसलमेर के गोपा चौक से शुरू हुआ, जो आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंच गया।

तगाराम भील देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के सामने भी अपनी प्रस्तुतियां दे चुके हैं। उन्होंने फ्रांस, स्पेन, अमेरिका और जापान जैसे देशों में राजस्थान की लोकधुनों की गूंज पहुंचाई और अलगोजा को वैश्विक पहचान दिलाई। लोक कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पहले भी महारावल गिरधर पुरस्कार और मरुधरा पुरस्कार जैसे सम्मान मिल चुके हैं।

हनुमान चौराहे पर आयोजित अभिनंदन समारोह में स्थानीय लोगों ने कहा कि तगाराम भील ने रेगिस्तान की पारंपरिक कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाकर पूरे जैसलमेर का मान बढ़ाया है। लोगों ने उन्हें लोक संस्कृति का सच्चा दूत बताते हुए सम्मानित किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित