मोबाइल की दुनिया में सिमटते रिश्ते, खोती जा रही बचपन की गर्माहट

 


देवास/कन्नौद, 06 अप्रैल (हि.स.)। कभी गर्मियों की छुट्टियां रिश्तों की मिठास, अपनापन और बचपन की बेफिक्र हंसी से सराबोर हुआ करती थीं। स्कूल बंद होते ही बच्चों की पहली ख्वाहिश नानी-नाना के घर जाने की होती थी, जहां पहुंचते ही मानो खुशियों की नई दुनिया बस जाती थी। बड़े आंगन में खेल, मामा-मामी का स्नेह, भाई-बहनों के साथ दिनभर की मस्ती और बिना किसी रोक-टोक के बिताए पल ही असली आनंद का आधार थे।

तपती दोपहर में भी गली-मोहल्लों में क्रिकेट, शाम होते ही दोस्तों संग हंसी-मजाक और रात को छत पर चारपाई डालकर तारों भरे आसमान के नीचे बातें—ये सब सिर्फ यादें नहीं, बल्कि रिश्तों को जीने का तरीका थे। नानी के हाथ का खाना, परिवार के साथ बैठकर बातचीत और कहानियों के बीच नींद की गोद में खो जाना—इन सब में जो सुकून था, वह आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में कहीं गुम हो गया है।

डिजिटल दौर में बढ़ती दूरियां

वर्तमान समय में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। आज बच्चे हों या बड़े, अधिकतर समय मोबाइल स्क्रीन पर ही सिमट गया है। इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब जैसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर घंटों बिताने की आदत ने वास्तविक रिश्तों की जगह ले ली है। अब बातचीत औपचारिक होती जा रही है और अपनों के लिए समय निकालना चुनौती बनता जा रहा है।

आभासी जुड़ाव, वास्तविक दूरी

विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल माध्यमों ने जहां लोगों को वर्चुअली जोड़ा है, वहीं वास्तविक जीवन में दूरी बढ़ाई है। लोग ऑनलाइन तो हमेशा सक्रिय रहते हैं, लेकिन भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं।

मनोचिकित्सक डॉ. पवन राठी का कहना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अत्यधिक समय बिताने से व्यक्ति की सामाजिक और भावनात्मक जुड़ाव क्षमता प्रभावित होती है। लगातार स्क्रीन पर रहने से त्वरित मनोरंजन की आदत बन जाती है, जिससे वास्तविक जीवन की साधारण खुशियां फीकी लगने लगती हैं। वहीं, ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ की चाह अस्थायी संतुष्टि तो देती है, लेकिन गहरे रिश्तों की कमी को पूरा नहीं कर पाती।

तुलना और अकेलेपन का बढ़ता खतरा

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया पर दूसरों की “परफेक्ट लाइफ” देखकर लोग अपनी जिंदगी से तुलना करने लगते हैं, जिससे असंतोष और अकेलापन बढ़ता है। कई मामलों में यह स्थिति अवसाद तक का रूप ले लेती है।

कठिन समय में महसूस होती है रिश्तों की अहमियत

अकेलेपन का एहसास अक्सर तब गहराता है, जब व्यक्ति तनाव, असफलता या बीमारी जैसे कठिन दौर से गुजरता है। ऐसे समय में डिजिटल संपर्क बेअसर साबित होते हैं और सच्चे रिश्तों की कमी खलने लगती है।

बदलती जीवनशैली का प्रभाव

मोबाइल की बढ़ती लत ने बच्चों से उनके खेल के मैदान और बड़ों से उनके अपनों के साथ बिताने वाला समय छीन लिया है। आमने-सामने की बातचीत की जगह अब चैटिंग ने ले ली है और मुलाकातें केवल औपचारिकता तक सीमित रह गई हैं।

संतुलन ही है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक से दूरी नहीं, बल्कि संतुलित उपयोग जरूरी है। इसके लिए—

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रोजाना कुछ समय “डिजिटल डिटॉक्स” के लिए तय करें

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परिवार के साथ समय बिताकर खुलकर बातचीत करें

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बच्चों को आउटडोर खेलों के लिए प्रेरित करें

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रिश्तों को प्राथमिकता देते हुए नियमित समय निकालें

आज के डिजिटल युग में प्रगति जरूरी है, लेकिन यदि इस दौड़ में रिश्ते और भावनाएं पीछे छूट जाएं, तो यह विकास अधूरा रह जाएगा।

नानी के आंगन की वो खिलखिलाहट, छत पर बिताई गई वो रातें और अपनों के साथ बिताए गए छोटे-छोटे पल आज भी यह एहसास कराते हैं कि असली सुकून मोबाइल स्क्रीन में नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट में बसता है।

हिन्दुस्थान समाचार / देवेन्‍द्र राठी