सागर : उल्दन बांध से बढ़ी ग्रामीणों की चिंता, मानसून में दो किलोमीटर मार्ग डूबने की आशंका

 


सागर, 09 जून (हि.स.)। मध्‍य प्रदेश के सागर जिले के बंडा तहसील अंतर्गत धसान नदी पर बन रही महत्वाकांक्षी 'बंडा सिंचाई परियोजना' (उल्दन बांध) का काम अंतिम चरण में है। करीब 2610 करोड़ रुपये की इस वृहद परियोजना से क्षेत्र के 80,000 हेक्टेयर से अधिक कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई पद्धति (स्प्रिंकलर) से पानी पहुंचाने का लक्ष्य है। लेकिन इस विकास परियोजना की चमक के पीछे हजारों ग्रामीणों का दर्द और इस मानसून से पैदा होने वाला एक बड़ा यातायात संकट छिपा है। बांध के निर्माण और आगामी जलभराव की खबरों के साथ ही ग्रामीणों की 'उलझनें', नाराजगी और आवागमन की चिंताएं चरम पर पहुंच गई हैं।

प्रशासनिक तैयारियों के मुताबिक, उल्दन बांध में इसी मानसून (बरसात) से जलभराव की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। शुरुआती योजना के तहत इस बरसात में बांध की कुल क्षमता का 30 फीसदी पानी भरा जाएगा। पानी भरने की इस दस्तक के साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में विस्थापन की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। इस परियोजना के कारण 'सलैया गांव' पूरी तरह से जलमग्न हो जाएगा, जिसे शत-प्रतिशत विस्थापित किया जाना है। इसके अलावा इसके आसपास के 12 से अधिक गांव भी इस डूब क्षेत्र से प्रभावित हो रहे हैं।

बांध में पानी भरने का सीधा असर क्षेत्र के मुख्य परिवहन और आवागमन पर पड़ने वाला है। सागर से गढ़पहरा-बहरोल होते हुए प्रसिद्ध पर्यटन व ऐतिहासिक स्थल धामोनी जाने वाले मार्ग का एक बड़ा हिस्सा डूब क्षेत्र में आ रहा है। बहरोल और कुल्ल गांव के बीच का लगभग 2 किलोमीटर लंबा सड़क मार्ग पूरी तरह पानी में समा जाएगा।

इसका असर यह होगा कि यदि इस बरसात में 30% जलभराव के दौरान ही पानी सड़क तक पहुंच गया, तो इसी सीजन से यह मार्ग हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। वर्तमान में सागर से सीधे गढ़पहरा होकर धामोनी की दूरी महज 41 किलोमीटर है। रास्ता बंद होने के बाद लोगों को सागर से बांदरी होते हुए बहरोल और फिर धामोनी जाना पड़ेगा। सागर से बांदरी की दूरी 28 किलोमीटर और बांदरी से बहरोल-धामोनी की दूरी 26 किलोमीटर है, जिससे अब कुल दूरी बढ़कर 54 किलोमीटर हो जाएगी। यानी राहगीरों को 13 किलोमीटर का अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ेगा।

राहत की बात यह है कि बांध बनने के बावजूद बंडा से बहरोल होते हुए बांदरी आने-जाने वाला मार्ग पहले की तरह चालू रहेगा। इसके लिए बांध के गेटों के ठीक नीचे एक नए पुल का निर्माण किया जा रहा है। इस पुल के बन जाने से बांदरी से बहरोल होते हुए बंडा की दूरी में कोई खास बदलाव नहीं आएगा। गौरतलब है कि बंडा-छतरपुर मार्ग से बांदरी, मालथौन, ललितपुर और झांसी की ओर जाने वाले भारी और निजी वाहनों द्वारा इसी मार्ग का उपयोग सबसे ज्यादा किया जाता है, जिसे तकनीकी रूप से बहाल रखा जा रहा है।

चूंकि बहरोल से सागर की ओर जाने वाले मार्ग का एक हिस्सा डूब में आ रहा है, इसलिए आसपास के कई गांवों के ग्रामीणों का सीधा और पारंपरिक आवागमन प्रभावित होगा। इस समस्या से निपटने और ग्रामीणों की उलझन दूर करने के लिए प्रशासन द्वारा कई गांवों को जोड़ने वाली नई संपर्क सड़कें बनाने का काम शुरू कर दिया गया है। इन नई सड़कों को भविष्य की जरूरतों और जलस्तर के हिसाब से ऊंचाई देकर तैयार किया जा रहा है।

ग्रामीणों के आक्रोश की मुख्य वजह,

एक तरफ जहां रास्तों को बदलने और नई सड़कें बनाने का काम जारी है, वहीं दूसरी तरफ विस्थापित हो रहे ग्रामीणों का गुस्सा फूट रहा है। प्रभावित गांवों (जैसे किरौला, बहरोल, कुल्ल, पिपरिया, सेमरा, हनौता और उल्दन) के ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने भू-अर्जन और मुआवजे के वितरण में भारी लापरवाही बरती है। ग्रामीणों का आरोप है कि सर्वे टीम ने जल्दबाजी में उनके कई पक्के व पुश्तैनी मकानों को 'अस्थाई' (कच्चा/टीनशेड) घोषित कर दिया, जिससे मुआवजे की राशि बेहद कम हो गई। किसानों का कहना है कि एक ही गांव में अलग-अलग जमीनों और मकानों के लिए भेदभावपूर्ण दरों पर मुआवजा बांटा जा रहा है। आरोप लगाया गया है कि कई किसानों की हरी-भरी और कुएं से सिंचित जमीन को सरकारी कागजों में असिंचित दर्ज कर दिया गया है, जिससे उन्हें भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।

अपनी मांगों को लेकर प्रभावित परिवारों ने धसान नदी के ठंडे पानी में उतरकर 'जल सत्याग्रह' भी किया। वहीं, कुछ हताश किसान अपनी बात मनवाने के लिए 33 केवी की हाईटेंशन बिजली लाइन के टावरों पर भी चढ़ गए थे, जिसके बाद प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया था।

उल्दन बांध परियोजना निश्चित रूप से सागर, मालथौन, बंडा और शाहगढ़ के ग्रामीण इलाकों में सिंचाई का एक नया दौर लाएगी, लेकिन इसके लिए जिन ग्रामीणों को अपनी पैतृक जमीन और घर छोड़ने पड़ रहे हैं, उनके पुनर्वास को प्राथमिकता देनी होगी। जलभराव के कारण रास्ते बंद होने और दूरी बढ़ने से जनता को होने वाली परेशानी को देखते हुए संपर्क सड़कों का काम युद्धस्तर पर पूरा करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है, ताकि विकास की इस डगर पर आम नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस न करे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुमार चौबे