(श्रावण विशेष) अनूपपुर: मां नर्मदा उद्गम मंदिर परिसर के 11 रुद्र महादेव-शिव और मां रेवा की दिव्य आराधना का पावन धाम
अनूपपुर, 02 अगस्त (हि.स.)। विंध्य और सतपुड़ा पर्वतमालाओं के मध्य स्थित मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले का अमरकंटक, जहां मोक्षदायिनी मां नर्मदा का दिव्य उद्गम हुआ, श्रावण मास में शिवमय और भक्तिमय वातावरण से आलोकित हो उठता है। मां नर्मदा उद्गम मंदिर परिसर में स्थापित 11 रुद्र महादेव के दर्शन एवं पूजन के लिए प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। यहां मां नर्मदा और भगवान शिव की संयुक्त आराधना सनातन परंपरा में विशेष पुण्यदायी मानी जाती है।
अमरकंटक के धनंजय तिवारी बताते हैं कि स्कंद पुराण के रेवा खंड में अमरकंटक को देवताओं, ऋषियों और तपस्वियों की पुण्यभूमि बताया गया है। वहीं नर्मदा पुराण में मां नर्मदा को शिवकृपा से प्रकट, पापों का नाश करने वाली तथा मोक्ष प्रदान करने वाली पुण्यसलिला के रूप में महिमामंडित किया गया है। इसी भाव को व्यक्त करने वाली प्रसिद्ध पंक्ति है -दर्शनादेव नर्मदायाः स्नानात् पापं विनश्यति। अर्थात, मां नर्मदा के दर्शन और श्रद्धापूर्वक स्नान से पापों का क्षय होता है तथा पुण्य की प्राप्ति होती है। सनातन परंपरा में भगवान शिव के एकादश रुद्र सृष्टि की रक्षा, धर्म की स्थापना और लोककल्याण के प्रतीक माने गए हैं। इसी आध्यात्मिक भावना के अनुरूप उद्गम मंदिर परिसर में स्थित 11 रुद्र महादेव के समक्ष श्रद्धालु नर्मदा उद्गम का पवित्र जल अर्पित कर रुद्राभिषेक करते हैं।
श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार, प्रदोष एवं शिवपूजन के विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई देती है- त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ तथा शिव महिम्न स्तोत्र का यह प्रसिद्ध श्लोक श्रद्धालुओं को शिवभक्ति में निमग्न कर देता है-असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे, सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं, तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥ अर्थात, यदि नील पर्वत स्याही बन जाए, समुद्र दवात बन जाए, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी और पृथ्वी कागज बन जाए, तथा स्वयं मां सरस्वती अनंत काल तक लिखती रहें, तब भी भगवान शिव के गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं किया जा सकता।
श्रद्धालु शिव पंचाक्षरी मंत्र—ॐ नमः शिवायऔर हर हर महादेव, नर्मदे हर के जयघोष के साथ मां नर्मदा उद्गम का जल 11 रुद्र महादेव को अर्पित करते हैं। संपूर्ण मंदिर परिसर वैदिक ऋचाओं, रुद्रपाठ, घंटा-घड़ियाल और शंखध्वनि से गुंजायमान रहता है।
धर्माचार्यों का मत है कि श्रावण मास में मां नर्मदा के उद्गम पर स्नान, भगवान शिव के रुद्रस्वरूपों का अभिषेक तथा शिव-नर्मदा की संयुक्त आराधना करने से आध्यात्मिक शांति, आरोग्य, सुख-समृद्धि और लोकमंगल की भावना पुष्ट होती है। यही कारण है कि श्रावण मास में अमरकंटक का यह दिव्य धाम देशभर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था, तप, भक्ति और सनातन संस्कृति का अद्वितीय केंद्र बन जाता है।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला