अनूपपुूर: धर्म को ऊंचाइयों की सीढ़ी बनाकर देश को जातिभेद में बांटना बंद करे सरकार : श्रीधर शर्मा
अनूपपुर, 08 सितंबर (हि.स.)। धर्म को ऊंचाइयों की सीढ़ी बनाकर देश को जातिभेद में बांटना बंद करे सरकार। भगवान राम केवल किसी राजनीतिक दल की आस्था का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों सनातनियों की श्रद्धा, संस्कृति और जीवन-मूल्यों के आधार हैं। ऐसे में भगवान राम के नाम पर राजनीति करना और सनातन धर्म के वास्तविक मार्गदर्शक संतों की उपेक्षा करना सनातन समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
यह बात मंगलवार को अमरकंटक में बहुभाषी न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत के दौरान ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य जी के परम धर्म सांसद श्रीधर शर्मा ने कही।
श्रीधर शर्मा ने सत्तारूढ़ दल पर भगवान राम और सनातन धर्म के नाम का राजनीतिक उपयोग करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो लोग भगवान राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ और महापुरुष बताते रहे हैं, वही आज राजनीतिक लाभ के लिए भगवान की परिभाषा और सनातन की दिशा तय करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भगवान राम किसी दल, व्यक्ति या सत्ता के नहीं, बल्कि समूचे सनातन समाज की आस्था हैं।
राम मंदिर आंदोलन में संत समाज की भूमिका को कैसे भुलाया जा सकता है?
श्रीधर शर्मा ने कहा कि अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि को लेकर संघर्ष और मंदिर निर्माण की वैचारिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि तैयार करने में संत समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने विशेष रूप से ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि राम जन्मभूमि के विषय को लेकर संतों ने लंबे समय तक संघर्ष किया और कानूनी लड़ाई भी लड़ी। वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने भी संत परंपरा और धार्मिक पक्ष को न्यायालय के समक्ष रखने की भूमिका निभाई। ऐसे में मंदिर निर्माण के बाद उसी संत समाज को किनारे कर दिया जाना सनातन परंपरा के प्रति गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
संतों ने समाज को जोड़ा, राजनीति ने बांटने का काम किया
श्रीधर शर्मा ने कहा कि संत समाज ने सदियों से समाज को जोड़ने, सामाजिक समरसता स्थापित करने और कमजोर वर्गों की आवाज बनने का कार्य किया है। जब समाज में जातिगत विभाजन और सामाजिक वैमनस्य बढ़ाने वाली परिस्थितियां पैदा हुईं, तब सनातन संतों ने आगे आकर सामाजिक जिम्मेदारी निभाई और कई बार अपमान एवं विरोध भी सहा। उन्होंने कहा कि संतों की भूमिका केवल मंदिरों और मठों तक सीमित नहीं है। गौसेवा, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, गरीबों की सहायता और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर संत समाज लगातार काम करता आया है।
गौवंश की सेवा में संत आगे, सरकार के दावे पीछे क्यों?
श्री शर्मा ने गौवंश संरक्षण को लेकर भी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि गौमाता के नाम पर राजनीति करना आसान है, लेकिन सड़कों पर भटकते गौवंश, गौशालाओं की वास्तविक स्थिति और किसानों के सामने खड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान करना कठिन। उन्होंने कहा कि अनेक संत और धार्मिक संस्थाएं अपने स्तर पर गौसेवा और गौसंरक्षण का कार्य कर रही हैं। यदि सरकार वास्तव में गौवंश के प्रति गंभीर है तो उसे केवल घोषणाओं और धार्मिक आयोजनों तक सीमित रहने के बजाय गौशालाओं की व्यवस्था, चारे, चिकित्सा, संरक्षण और बेसहारा गौवंश के स्थायी प्रबंधन पर ठोस काम करना चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि धर्म और गौमाता का नाम लेकर भावनात्मक माहौल तैयार करना अलग बात है और जमीन पर सनातन मूल्यों की रक्षा करना अलग। संत समाज वर्षों से जो काम कर रहा है, उसे राजनीतिक मंच से अपने खाते में जोड़ना उचित नहीं है।
‘अविमुक्तेश्वरानंद जी ने संत समाज की जिम्मेदारी निभाई’
श्रीधर शर्मा ने कहा कि वर्तमान ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज ने संत समाज की परंपरा और धार्मिक दायित्व को निभाते हुए अनेक अवसरों पर धर्म, गौवंश और सनातन संस्कृति से जुड़े प्रश्नों को मजबूती से उठाया है।
उन्होंने कहा कि किसी संत की बात सत्ता के अनुकूल हो तो उसे सम्मान और असहमति हो तो उसे विवाद का विषय बनाना उचित नहीं। संतों का दायित्व सत्ता का समर्थन करना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सत्ता को धर्म और मर्यादा का मार्ग दिखाना है।
सनातन के नाम पर दिखावा नहीं, धरातल पर काम चाहिए
शर्मा ने कहा कि सनातन धर्म का वास्तविक अर्थ केवल बड़े धार्मिक आयोजन, मंदिर निर्माण या राजनीतिक मंचों पर जय श्रीराम के नारे तक सीमित नहीं है। सनातन की आत्मा सत्य, मर्यादा, करुणा, सेवा, गौसंरक्षण, सामाजिक समरसता और धर्माचार्यों के सम्मान में है। उन्होंने कहा कि यदि सत्ता वास्तव में सनातन की हितैषी है तो उसे संत समाज का सम्मान करना होगा, गौवंश की वास्तविक सेवा करनी होगी और समाज को जाति तथा वर्ग के नाम पर बांटने वाली राजनीति से ऊपर उठना होगा।
श्रीधर शर्मा ने कहा कि भगवान राम के नाम पर सत्ता प्राप्त की जा सकती है, लेकिन भगवान राम की मर्यादा को केवल राजनीतिक मंच पर दोहराने से कोई रामभक्त नहीं बन जाता। रामराज्य की बात करने वालों को पहले राम की मर्यादा, न्याय, करुणा और लोककल्याण की भावना को अपने आचरण में उतारना होगा।
अंत में उन्होंने कहा कि सनातन धर्म किसी एक राजनीतिक दल की जागीर नहीं है। सनातन करोड़ों लोगों की जीवन-पद्धति है और उसके वास्तविक प्रहरी संत समाज हैं। इसलिए संतों की उपेक्षा और धर्म का राजनीतिक इस्तेमाल अंततः सनातन समाज के लिए ही नुकसानदायक सिद्ध होगा।
हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला