घने जंगल और पहाड़ के बीच विराजित हैं मां विरासनी, सात बहनों के साथ होती है पूजा

 




अनूपपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में अमरकंटक स्थित नर्मदा उद्गम स्थल के बारे में तो देशभर के श्रद्धालु जानते हैं, लेकिन इसी जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड के ग्राम तुलरा में घने जंगलों के बीच स्थित तुलराधाम आज भी बहुत से लोगों के लिए अनजान है। पहाड़ पर बने इस प्राचीन धाम में चतुर्भुजी मां विरासनी अपनी सात बहनों के साथ विराजित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहां मां के दर्शन के लिए जंगल के राजा शेर भी पहुंचते हैं। क्षेत्र के श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर देवी के दरबार में आते हैं।

विंध्य क्षेत्र में प्राचीन देवी-देवताओं की अनेक प्रतिमाएं मौजूद हैं। इन्हीं में तुलरा गांव के तुलरागढ़ में स्थापित मां विरासनी की प्रतिमा भी शामिल है। स्थानीय ग्रामीणों की मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता पूरी करती हैं। श्रद्धालु यहां संतान प्राप्ति और अन्य मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर में क्वांर और चैत्र नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना होती है। भक्त ज्योति कलश प्रज्वलित कराते हैं और जवारे बोए जाते हैं।

स्वप्न में दर्शन देने की प्रचलित है मान्यता

ग्रामीणों के अनुसार, मां विरासनी की प्रतिमा से जुड़ी एक पुरानी कथा प्रचलित है। बताया जाता है कि कई दशक पहले बैगा जनजाति के एक व्यक्ति को सपने में माता ने दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि वह तुलरा की कुल्हाड़ी नदी में हैं और उसे वहां से ले जाने के लिए कहा।

अगली सुबह बैगा व्यक्ति नदी पहुंचा और प्रतिमा को देखा। प्रतिमा भारी होने के कारण वह उसे उठा नहीं पाया और वापस लौट आया। ग्रामीण मान्यता के मुताबिक, उसी रात माता फिर सपने में आईं। जब व्यक्ति ने प्रतिमा के भारी होने की बात कही, तो माता ने उसे उठाकर देखने को कहा। साथ ही यह भी बताया कि वह जहां प्रतिमा रख देगा, वहां से उसे दोबारा नहीं उठा सकेगा।

इसके बाद बैगा व्यक्ति नदी में पहुंचा। उसने श्रीफल चढ़ाकर पूजा-अर्चना की और प्रतिमा को सिर पर रखकर चल पड़ा। जंगल में प्रवेश करने के बाद उसे एक जलप्रपात दिखाई दिया और प्यास लगने पर उसने पानी पीने का निर्णय लिया। वह प्रतिमा को महुआ के पेड़ के नीचे रखकर पानी पीने चला गया। लौटने के बाद उसने प्रतिमा को फिर उठाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिली। इसके बाद वह माता को प्रणाम कर वहीं से लौट गया। कुछ समय बाद लोगों को प्रतिमा के बारे में जानकारी मिली और धीरे-धीरे श्रद्धालुओं का यहां पहुंचना शुरू हो गया।

1997 में मंदिरों का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा

ग्रामीणों के मुताबिक, पहले तुलरागढ़ के आसपास घना जंगल था। वर्ष 1997 में वन विभाग के अधिकारियों ने बनारस से विद्वानों को बुलवाया। इसके बाद यहां मां विरासनी के मंदिर के साथ राम दरबार और भगवान शंकर के मंदिर का निर्माण कराया गया तथा प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा कराई गई।

वर्ष 1997 से मंदिर में प्रधान पुजारी के रूप में सेवा दे रहे उमेश पाठक बताते हैं कि नवरात्रि के दौरान यहां विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है और जवारे बोए जाते हैं। इसके साथ ही भजन-कीर्तन, हवन और भंडारे का आयोजन भी होता है।

जंगल, पहाड़ और जलप्रपात के बीच स्थित है धाम

तुलराधाम सरई और बेल के पेड़ों से घिरे जंगल तथा पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। यहां माता के स्थान के पास जलप्रपात भी है। स्थानीय लोगों के अनुसार, आसपास जंगल में शेरों की कई गुफाएं हैं और माता के दर्शन के लिए उनकी सवारी आने की मान्यता भी प्रचलित है।

जलप्रपात का पानी आसपास के किसानों के लिए भी उपयोगी है। ग्रामीण इस पानी को अपने खेतों तक ले जाकर सिंचाई करते हैं। दुर्गम वन क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां तक पहुंचने वाले लोगों की संख्या लंबे समय तक सीमित रही। हालांकि, मां विरासनी की प्रसिद्धि बढ़ने के साथ ही अब आसपास के गांवों से हजारों श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहां मेला भी लगता है।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला