शनिवार से शुरू होगा 15 दिवसीय पितृपक्ष, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या

 




सीहोर, 25 सितंबर (हि.स.)। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व पितृपक्ष शनिवार, 26 सितंबर से प्रारंभ होगा। इस वर्ष पितृपक्ष 15 दिनों का रहेगा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और अन्य धार्मिक अनुष्ठान करेंगे। जिन पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, उनका श्राद्ध सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन किया जाएगा।

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार, ऋषि-मुनियों द्वारा रचित धार्मिक ग्रंथों में मनुष्य पर तीन प्रमुख ऋण बताए गए हैं, जिनमें देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण शामिल हैं। पितृपक्ष इन ऋणों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष अवसर माना गया है। इस दौरान विधि-विधान से श्राद्ध और तर्पण कर पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष पितृपक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि, शनिवार 26 सितंबर से शुरू होकर आश्विन मास की सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या, शनिवार 10 अक्टूबर तक चलेगा। अष्टमी और नवमी तिथि के एक ही दिन आने के कारण इस बार पितृपक्ष 15 दिनों का रहेगा।

तर्पण और श्राद्ध का विशेष महत्व

सनातन परंपरा में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर माना गया है। इस अवधि में श्रद्धालु अपने पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तर्पण में जल, तिल और कुशा का उपयोग किया जाता है।

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार, जिले में श्रद्धालु मां नर्मदा, पार्वती नदी, सिवन घाट सहित अन्य नदियों के तटों पर तर्पण करते हैं। जो लोग नदी तट तक नहीं जा पाते, वे अपनी सुविधा के अनुसार घर पर भी पितरों का तर्पण और श्राद्ध कर सकते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण कर उनके निमित्त किए गए धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व होता है। गरुड़ पुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में पितरों के प्रति श्रद्धा और तर्पण की महत्ता का वर्णन मिलता है।

गौसेवा, अन्नदान और पौधरोपण का महत्व

पितृपक्ष के दौरान पितरों की स्मृति में ब्राह्मण भोजन, अन्नदान, वस्त्रदान और जरूरतमंद लोगों की सहायता करने की परंपरा है। इसके साथ ही गौसेवा को भी विशेष महत्व दिया गया है। पंडित शर्मा ने श्रद्धालुओं से अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा और दान के कार्य करने की बात कही।

पूर्वजों की स्मृति और आत्मशांति के लिए श्रीमद्भागवत कथा, पितृ भागवत और पितृ सूक्त का पाठ कराने की भी धार्मिक परंपरा है। पितरों की स्मृति में पीपल, बरगद और फलदार पौधों का रोपण करने तथा दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा भी बताई गई है।

इस तरह रहेगा पितृपक्ष का क्रम

-

26 सितंबर, शनिवार – पूर्णिमा श्राद्ध

-

27 सितंबर, रविवार – प्रतिपदा श्राद्ध

-

28 सितंबर, सोमवार – द्वितीया श्राद्ध

-

29 सितंबर, मंगलवार – तृतीया श्राद्ध

-

30 सितंबर, बुधवार – चतुर्थी श्राद्ध

-

1 अक्टूबर, गुरुवार – पंचमी श्राद्ध, महाभरणी

-

2 अक्टूबर, शुक्रवार – षष्ठी श्राद्ध

-

3 अक्टूबर, शनिवार – सप्तमी श्राद्ध

-

4 अक्टूबर, रविवार – अष्टमी एवं नवमी श्राद्ध, मातृ नवमी

-

5 अक्टूबर, सोमवार – दशमी श्राद्ध

-

6 अक्टूबर, मंगलवार – एकादशी श्राद्ध

-

7 अक्टूबर, बुधवार – द्वादशी श्राद्ध, संन्यासी श्राद्ध

-

8 अक्टूबर, गुरुवार – त्रयोदशी श्राद्ध

-

9 अक्टूबर, शुक्रवार – चतुर्दशी श्राद्ध

-

10 अक्टूबर, शनिवार – सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या

पितृपक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करेंगे। वहीं जिन पितरों की तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए 10 अक्टूबर को सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा