शिक्षक पात्रता परीक्षा अनिवार्यता पर पुनर्विचार की मांग तेज, दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को लिखा पत्र
भोपाल, 04 अप्रैल (हि.स.)। मध्यप्रदेश में शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) को अनिवार्य किए जाने के फैसले को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर दो लाख से अधिक शिक्षकों के हित में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने राज्य सरकार से आग्रह किया है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के संदर्भ में रिव्यू या क्यूरेटिव पिटीशन दायर की जाए, ताकि टीईटी की अनिवार्यता को भूतलक्षी के बजाय भविष्यलक्षी रूप से लागू कराया जा सके।
शिक्षकों में बढ़ी चिंता, नौकरी पर संकट की आशंका
मार्च 2026 में जारी आदेश के अनुसार प्रदेश में जुलाई-अगस्त 2026 में टीईटी परीक्षा प्रस्तावित है। इस निर्णय से स्कूल शिक्षा और आदिवासी विकास विभाग के दो लाख से अधिक शिक्षकों में गहरी चिंता है। दिग्विजय सिंह ने कहा कि 25–30 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के लिए करियर के अंतिम चरण में परीक्षा अनिवार्य करना अनुचित है। परीक्षा में असफलता की स्थिति में सेवा समाप्ति या समयपूर्व सेवानिवृत्ति का खतरा उत्पन्न हो सकता है, जिससे हजारों परिवार आर्थिक संकट में आ सकते हैं।
“राज्य सरकार खुद रखे कोर्ट में पक्ष”
पत्र में उन्होंने यह भी कहा कि यदि शिक्षक स्वयं सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करते हैं, तो उन्हें महंगे वकीलों की सेवाएं लेनी पड़ेंगी, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ेगा। ऐसे में राज्य सरकार को आगे आकर शिक्षकों का पक्ष न्यायालय में रखना चाहिए, ताकि उन्हें राहत मिल सके। उन्होंने उल्लेख किया कि सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय महाराष्ट्र से जुड़े मामलों (सिविल अपील 1385-1386/2025) पर आधारित है, जिसमें मध्यप्रदेश पक्षकार नहीं था। इसके बावजूद राज्य में इसे लागू किया जाना न्यायोचित नहीं है।
मेरिट आधारित भर्ती और अनुभव का हवाला
दिग्विजय सिंह ने कहा कि प्रदेश में पिछले 25 वर्षों से व्यापम के माध्यम से मेरिट आधारित भर्ती होती रही है और शिक्षक बी.एड. जैसी आवश्यक योग्यताएं पहले ही प्राप्त कर चुके हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षकों के प्रयासों से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, जिसका प्रमाण बेहतर परीक्षा परिणाम और यूपीएससी में चयनित छात्र हैं।
प्रमुख मांगें
दिग्विजय सिंह ने सरकार से मांग की—
टीईटी को भूतलक्षी प्रभाव से लागू न किया जाए
वर्तमान शिक्षकों को अनिवार्यता से छूट दी जाए
आरटीई कानून को लागू तिथि से प्रभावी माना जाए
राज्य सरकार स्वयं रिव्यू/क्यूरेटिव पिटीशन दायर करे
अंतिम निर्णय तक टीईटी अनिवार्यता पर रोक लगाई जाए
उम्रदराज शिक्षकों पर दबाव अनुचित
उन्होंने सवाल उठाया कि 40–50 वर्ष आयु वर्ग के शिक्षकों से दोबारा परीक्षा लेना कितना उचित है। इससे मानसिक और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। उन्होंने बताया कि शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात कर अपनी समस्याएं रखीं, जिसके बाद उन्होंने यह मुद्दा उठाया। दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि प्रदेश के लाखों शिक्षकों के हितों की रक्षा के लिए शीघ्र कानूनी कदम उठाए जाएं और टीईटी की अनिवार्यता पर पुनर्विचार किया जाए, ताकि शिक्षकों की नौकरी और भविष्य सुरक्षित रह सके।
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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे