पर्यूषण पर्व : भगवान श्री अजीतनाथ की प्रतिदिन की जा रही परम सौन्दर्यकारी अंगरचना
मंदसौर। 10 सितंबर (हि.स.)। पर्यूषण पर्व के अंतर्गत मंदसौर नगर के जनकूपुरा स्थित तीर्थ मंडन, 400 वर्ष प्राचीन भगवान अजितनाथ प्रभु की प्रतिदिन परम सौन्दर्यकारी अंगरचना की जा रही है। जिसके दर्शन वंदन करने के लिए बडी संख्या में भक्तगण पधार रहे हैं।
पर्यूषण पर्व के तृतीय दिवस 10 सितंबर को भगवान की आंगी का विशेषण युक्त नाम परमसौन्दर्यकारी अंगरचना पूज्य मुनिश्री प्रत्यक्षरत्नविजयजी ने प्रदान किया है। क्योंकि परमात्मा हमारी आत्मा को वास्तविक सौन्दर्य प्रदान करने वाले हैं। प्रभु की ऐसी विशेष अंगरचना के दिव्य दर्शन से हमारे अंतर्मन में शुद्धता, निर्मलता एवं आत्मिक सौन्दर्य की सहज अनुभूति होती है। इस अंगरचना में उत्तम एवं शुद्ध द्रव्यों तथा विविध पुष्पों का प्रयोग किया गया है। यह अंगरचना प्रभु के परम सौन्दर्य एवं आत्मिक निर्मलता के भाव को समर्पित है। प्रभु के दिव्य स्वरूप के दर्शन हमारे भीतर भी आत्मिक सौन्दर्य एवं पवित्रता के भाव जागृत करें।
देवद्रव्य की महत्ता समझे, उसमें वृद्धि का प्रयास करे - मुनिश्री पवित्ररत्न विजयजी
पर्युषण पर्व के अंतर्गत जीवागंज स्थित राजेन्द्र विलास में प्रतिदिन प्रात: 8.30 से 10.30 बजे तक अष्टान्हिका शास्त्र का वाचन हो रहा है। इसके वाचन के अंतर्गत मुनिश्री प्रत्यक्षरत्नविजयजी व श्री पवित्ररत्नविजयजी म.सा. पर्युषण पर्व के 5 दैनिक कर्तव्य व श्रावक-श्राविकाओं के 11 वार्षिक कर्तव्य श्रवण करा रहे हैं। कल गुरुवार को श्री पवित्ररत्नविजयजी म.सा. ने 11 वार्षिक कर्तव्य श्रवण करते हुये देव द्रव्य की महत्ता बतायी और कहा कि देव द्रव्य की महत्ता जैन आगमों में विशिष्ट बतायी गयी है। देवद्रव्य का अर्थ है जो प्रभुपूजा के लिये है। जीवन में हम सभी को देवद्रव्य की वृद्धि हो ऐसा कार्य करना चाहिये। कई बार हम चढावे बोल देते हैं लेकिन समय पर चढावे की राशि जमा नहीं कराते हैं। इससे हमें देवद्रव्य का दोष लगता है हमें इससे बचना चाहिये। देवद्रव्य की बोली लेने वाले सभी श्रावक-श्राविका यदि आर्थिक रूप से सक्षम हैं तो वे प्रतिदिन मंदिर में उपयोग आने वाले द्रव्य जैसे केशर, चन्दन, धूप, बत्ती इत्यादि अपने साथ लावे। मंदिर के ये द्रव्य उन लोगों के लिये होने चाहिये जो कि प्रतिदिन इसे लाने में समर्थ नहीं हैं। ध्यान रखना कि जब भी चढ़ावे बोलें उदार भाव से बोलें केवल चढ़ावा लेना हमारा लक्ष्य नहीं हो बल्कि परमात्मा के देवद्रव्य में वृद्धि हो यह हमारा भाव होना चाहिये। चढ़ावा लेने वाले यदि उस राशि को उसी समय जमा करायेंगे तो उनका पूर्ण फल उसी समय हमें मिलेगा। इसलिये वर्ष-दर-वर्ष न सही जमा कराने की भी हमारी आदत है उसे छोड़ो, हाथों-हाथ जमा कराओ और हाथों-हाथ पुण्य फल पाओ। आपने इस अवसर पर श्रुत पूजा अर्थात ज्ञान पूजा की भी महत्ता बतायी। इस अवसर पर कल्पसूत्र ग्रन्थ विधान के चढ़ावे एवं ज्ञान पूजा की बोली के चढ़ावे की बोली लगायी गयी जिसका धर्मलाभ भाग्यशाली परिवारों ने लिया। धर्मसभा के पश्चात मदनलाल चपरोत परिवार व सौभागमल संघवी परिवार ने प्रभावना वितरित की।
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हिन्दुस्थान समाचार / अशोक झलोया