भोपाल: एकात्म भाव ही शाश्वत सत्यः सदविद्यानंद सरस्वती
भोपाल, 06 अक्टूबर (हि.स.)। हमारे शास्त्र अद्वैत सिद्धांत की बात करते हैं। उनमें एकात्मक की चर्चा मिलती है। जिस प्रकार सूरज में एक प्रकार की संपूर्णता होती है उसी तरह अद्वैत भी एकात्म होता है। इस संसार में बहुत से भेद दिखाई देते हैं और आमतौर पर हम इनमें ही जीते हैं। किंतु हमारे शास्त्र कहते हैं कि सब कुछ एक है। किसी भी तरह का द्वंद अंतिम सत्य नहीं होता है।
ये बातें आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की स्वामिनी सदविद्यानंद सरस्वती नें कहीं। वे मंगलवार काे एमसीयू में आयोजित तीन दिवसीय टेडेक्स टॉक के प्रथम सत्र में विद्यार्थियों को संबोधित कर रही थीं।
विचारों से बदलती दुनिया की थीम पर आयोजित इस कार्यक्रम में वे अद्वैत जीवन दृष्टि पर बोल रहीं थीं। उन्होंने कहा कि वेदों का सार यही है। वेद ज्ञान का शरीर हैं। ये ग्रंथ ज्ञान का केंद्र हैं। वेद शब्द की उत्पत्ति विद शब्द हुई है। इसका आशय ज्ञान से है। ज्ञान सार्वभौमिक और वस्तुनिष्ठ होता है। इस तरह ज्ञान भी एकात्म है। और यही एकात्म वास्तविकता होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह का भेद भय पैदा करता है। भय से अशांति और अनिश्चिता आती हैं। और ऐसी परिस्थिति में सुख का अभाव होता है। एकात्म का भाव भय को दूर करता है।
उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि तीन दशकों से अधिक समय की अपनी यात्रा में विश्वविद्यालय आज अंतर्राष्ट्रीय स्तर के टेडेक्स टॉक का आयोजन कर हर्ष का अनुभव कर रहा है। उन्होंने कहा कि वैदिक परंपरा को आचार्य शंकर ने एक विशिष्ट रूप में हमारे सामने रखा। यही परंपरा स्वामी विवेकानंद तक आती है। धरती पर ओमकारेश्वर ही एक ऐसी जगह है जहां 11-12 वर्ष के बालक शंकर ने ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे इस आयोजन के व्याख्यानों को ध्यान से सुनें और उनके महत्वपूर्ण बिंदुओं को अपने जीवन में उतारें।
इस कार्यक्रम में दूसरे सत्र में मुख्य वक्ता, भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी, मनोज श्रीवास्तव ने डिजिटल दौर मे बदलता भाषा का स्वरूप और युवा विषय पर बोलते हुए कहा कि भारतीय समाज की यात्रा अंर्तनेत्र से इंटरनेट तक की यात्रा है जिसमें माध्यम, संस्कृति आदि तमाम चीजें बदलीं हैं। इसके साथ ही सृष्टि या विश्व भी बदला है और उसे देखने की हमारी दृष्टि भी बदली है।
उन्होंने कहा कि भारतीय संदर्भ में देखें तो श्रुति और स्मृति हमारी वास्तविक वाचिक परंपरा और संस्कृति के परिचायक हैं। श्रुति से जब लिपि का विकास हुआ तो लिपियों ने भाषा को व्याकरणिक स्वरूप दिया और एक प्रकार के अनुशासन में उसे बांध दिया। इसके बाद लेखन होने लगा तो भाषा साधना से साधन बन गई। प्रिंटिंग के आविष्कार के बाद भाषा लिखित से मुद्रित हो गई और आज डिजिटल युग में तमाम प्लेटफार्म के दौर में भाषा के साथ बहुत से परिवर्तन महसूस किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भाषा एक परंपरा होती है जो उत्तराधिकार से हमें मिलती है। यह अपने साथ संस्कार लेकर आती है। आज मानव के भाषिक व्यवहार का पूरा संसार बदल गया है। युवाओं में चीजों को लेकर सहजता होती है भाषिक शब्दों की क्षमता बड़ी है मैथिली राजस्थानी आदि क्षेत्रीय भाषाओं में बिजली कारण से भाषा की क्षमता बड़ी है भाषा के साथ प्रयोग उसकी जीवंत का परिचायक है आज का युवा भाषा का नायक है वह नहीं भाषण कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश राजपूत ने एक स्क्रीन करोड़ों कहानियां विषय पर अपनी टेलिविजन पत्रकारिता की मार्मिक और प्रभावशाली संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा कि टीवी पत्रकारिता करते हुए हम हर दिन कई कहानियों से रू-ब-रू होते हैं। हर कहानी में एक दर्द, एक खुशी एक सवाल और एक समाधान होता है। उन्होंने दुष्यंत कुमार के घर टूटने से लेकर बुंदेलखंड की बिल्लोरानी, झाड़ी में मिली नवजात बच्ची से लेकर प्रधानमंत्री आवास योजना की हकीकत वाली स्टोरीज को रोचक अंदाज में सुनाकर सभागार का दिल जीत लिया।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजू विश्वकर्मा