अनूपपुर: आवेदन की समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी कार्यवाही नहीं, धरने पर बैठे जनपद सदस्य

 


अनूपपुर, 25 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले के जनपद पंचायत अनूपपुर के अध्यक्ष के खिलाफ दिए गए अविश्वास प्रस्ताव को वैधानिक समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी ठंडे बस्ते में डाले रखने से आक्रोशित सदस्यों ने सोमवार को प्रशासन के खिलाफ आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया।

उन्होंने कलेक्ट्रेट के मुख्य द्वार जनपद सदस्यों ने अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस स्मरण-पत्र के बाद भी तत्काल वैधानिक कदम नहीं उठाए गए, तो वे कानून और संविधान के दायरे में रहकर सीधे उच्च न्यायालय की शरण लेंगे और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष कलेक्ट्रेट की इस मनमानी की शिकायत दर्ज कराएंगे। आंदोलन का प्रेमला सिंह, उर्मिला पाव, रानी, दुर्गावती, उषा सिंह और आराधना सहित अन्य सभी निर्वाचित सदस्य पूरी मजबूती के साथ डटे हुए हैं।

ज्ञात हो कि बीते 11 मई 2026 को जनपद पंचायत अनूपपुर के अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए पर्याप्त कानूनी बहुमत और सभी असंतुष्ट सदस्यों के हस्ताक्षर कर कलेक्टर सौप कर हटाने की मांग की। जिसकी समय सीमा आज समाप्तर होने के बाद भी कुछ नही किये जाने पर जनपद सदस्यों ने अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि इस स्मरण-पत्र के बाद भी तत्काल वैधानिक कदम नहीं उठाए गए, तो वे कानून और संविधान के दायरे में रहकर सीधे उच्च न्यायालय की शरण लेंगे और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष कलेक्ट्रेट की इस मनमानी की शिकायत दर्ज कराएंगे।

जनपद सदस्यों ने ने बताया कि जनपद पंचायत अनूपपुर के बहुसंख्यक निर्वाचित सदस्यों ने वर्तमान अध्यक्ष की कार्यप्रणाली और उनके प्रति अविश्वास जताते हुए मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 28 के तहत एक बकायदा लिखित नोटिस कलेक्टर एवं विहित प्राधिकारी के समक्ष पेश किया था। इस नोटिस में अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए पर्याप्त कानूनी बहुमत और सभी असंतुष्ट सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद थे, जिसकी अधिकारिक पावती भी सदस्यों को दी गई थी। कानूनी और वैधानिक प्रावधानों के अनुसार, मध्य प्रदेश पंचायत नियम (जनपद पंचायत तथा जिला पंचायत के अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव) के अंतर्गत विहित प्राधिकारी अथवा कलेक्टर को ऐसा कोई भी आधिकारिक अविश्वास प्रस्ताव नोटिस प्राप्त होने के ठीक 15 दिनों के भीतर एक विशेष बैठक बुलाना पूरी तरह अनिवार्य और बाध्यकारी होता है। नियत समय-सीमा का यह नियम इसलिए बनाया गया है ताकि स्थानीय निकायों में लोकतांत्रिक शुचिता बनी रहे और किसी भी प्रकार की हॉर्स-ट्रेडिंग या प्रशासनिक दुरुपयोग की गुंजाइश न बचे। परंतु, बेहद क्षोभ और प्रशासनिक विफलता का विषय यह है कि 25 मई को कानून द्वारा निर्धारित वह महत्वपूर्ण 15 दिनों की अनिवार्य समयावधि पूरी तरह समाप्त हो चुकी है, लेकिन कलेक्ट्रेट प्रशासन ने गहरी नींद से जागने की जहमत तक नहीं उठाई। हैरान करने वाली बात यह है कि इतने संवेदनशील और गंभीर राजनीतिक मामले में जिला प्रशासन द्वारा अब तक न तो मतदान और चर्चा के लिए किसी विशेष बैठक की तिथि घोषित की गई है और न ही इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल दिखाई दे रही है।

प्रशासन की इसी रहस्यमयी चुप्पी, उपेक्षात्मक रवैये और अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया को जानबूझकर टालने के गंभीर आरोपों के बीच सभी 13 पीड़ित जनपद सदस्यों ने सामूहिक रूप से कलेक्ट्रेट का घेराव किया और वहीं धरने पर बैठ गए। आंदोलन पर बैठे जनप्रतिनिधियों का स्पष्ट आरोप है कि जिला प्रशासन किसी अज्ञात राजनैतिक दबाव या प्रभाव में आकर वर्तमान अध्यक्ष को पिछले दरवाजे से बचाने का प्रयास कर रहा है, जो कि सीधे तौर पर पंचायती राज व्यवस्था के मूल सिद्धांतों की हत्या है।

धरना प्रदर्शन के दौरान आंदोलित सदस्यों ने कलेक्टर के नाम एक स्मरण-पत्र (रिमाइंडर) भी प्रशासनिक अधिकारी को सौंपा, जिसमें साफ तौर पर मांग की गई है कि मामले की संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक ढांचे को ध्यान में रखते हुए इस पर तत्काल संज्ञान लिया जाए। सदस्यों ने मांग की है कि बिना किसी और विलंब के अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा और पारदर्शी तरीके से मतदान संपन्न कराने के लिए तत्काल एक स्वतंत्र पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति की जाए और विशेष बैठक की तिथि व समय अविलंब तय किया जाए।

हिन्दुस्थान समाचार / राजेश शुक्ला