हमें अपने लिए जो ठीक नहीं लगता वह हम दूसरों के साथ न करें- डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा

 


झाबुआ, 25 सितम्बर (हि.स.)। जो व्यक्ति अपनी शक्ति के बल पर दुर्बल व्यक्ति को भयभीत और दुखी करता है, सताता है अंततः उसे भी भयभीत होकर घोर दुख का सामना करना पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हमें अपने लिए जो ठीक नहीं लगता वह हम दूसरों के साथ न करें।

उक्त विचार कथावाचक डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा द्वारा श्रीमद्भागवत कथा के दौरान व्यास पीठ से व्यक्त किए गए। वे मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के थान्दला में श्रीमद्भागवत भक्ति पर्व के अंतर्गत आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवतकथा महोत्सव के छठवें दिवस पर शुक्रवार को स्थानीय श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर सभागार में कथा वाचन कर रहे थे।

जरासंध द्वारा अहंकार के वशीभूत होकर कई राजाओं को कैदी बनाकर उत्पीड़ित किए जाने के श्रीमद्भागवत कथा में आए प्रसंग का उल्लेख करते हुए डॉ शर्मा ने कहा कि जो व्यक्ति अपनी शक्ति के बल पर दुर्बल व्यक्ति को भयभीत और दुखी करता है, सताता है अंततः उसे भी भयभीत होकर विषाद सहना ही पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हमें अपने लिए जो ठीक नहीं लगता वह हम दूसरों के साथ न करें, क्यौंकि प्रकृति का यह नियम है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, प्रतिफल स्वरूप वह अपने लिए भी वैसा ही पाता है। आज जिस किसी के द्वारा जो दिया है, वह आज नहीं तो कल पुनः उसी के पास लौट आता है।

शर्मा ने कहा कि जरासंध की दिग्विजय पर उसके द्वारा अहंकार के वशीभूत होकर उन बीस हजार राजाओं को कैद में डाल दिया गया था, जिन्होंने उसके समक्ष सिर नहीं झुकाए थे। अहंकार से भरे हुए जरासंध द्वारा उन्हें कैदखाने में त्रास दी जा रही थी, और उस दुष्ट से उन राजाओं को मुक्त कराने की सामर्थ्य किसी में नहीं थी, ऐसी स्थिति में उन राजाओं द्वारा किसी तरह एक व्यक्ति को दूत बनाकर उसके माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण से स्तुति पूर्वक जरासंध की कैद से अपनी मुक्ति हेतु प्रार्थना की गई। कैदी राजाओं द्वारा जब मुक्तिदाता भगवान् श्री कृष्ण से अनुनय विनय करते हुए अपनी मुक्ति हेतु भगवान् श्रीकृष्ण को संदेश भेजा गया, तो उनके द्वारा शुद्ध हृदय से की गई प्रार्थना पर करुणानिधान भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं वहां पहुंचे और न केवल उन्हें कैदखाने से मुक्त कराया, बल्कि अधर्मी और अत्याचारी राजा जरासंध को भीम के द्वारा मरवा दिया गया, मृत्यु के समय उसे दारुण दुःख का सामना करना पड़ा।।

श्रीमद्भागवत में आए सुदामा प्रसंग का वाचन करते हुए शर्मा ने कहा कि श्रीसुदामाजी निरपेक्ष भाव को प्राप्त, शांतचित्त, विषयों से विरक्त और जितेन्द्रिय महात्मा थे। वे भगवान् श्रीकृष्ण के निष्काम भक्त और एक महान् तत्वदर्शी महात्मा थे, जिन्होंने अपने लिए कभी किसी से कोई याचना ही नहीं की। उनके ह्रदय में अवस्थित प्रभु के प्रति अगाध प्रेम के वशीभूत होकर ही भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें अपने हृदय से लगाते हुए उन्हें सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया था। श्री सुदामा का ऐसा अद्भुत स्वागत अभिनन्दन सिद्धों और योगियों के लिए भी दुर्लभ है।

डॉ शर्मा ने कहा कि मनुष्य जीवन का एक यही पुरुषार्थ है कि कैसे भी हो, हम भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में प्रीति करें। भगवान् के प्रति निष्काम भाव से किया जाने वाला प्रेम ही मुक्तिपथगामी और सार्थक तथा अक्षुण्ण रहने वाला है, जबकि सांसारिक व्यक्ति, वस्तु से प्रेम निरर्थक दोषपूर्ण और शरीर के समाप्त होने के साथ ही समाप्त होने वाला है।

श्रीमद्भागवत कथा के दौरान कुछ विद्वानों द्वारा श्री सुदामाजी को याचक अथवा भिखारी की उपमा देते हुए किए जाने वाले उनके चरित्र चित्रण को शर्मा ने वास्तविकता से परे बताते हुए उन्हें भगवान् श्री कृष्ण के चरणों में अनुरक्त एक निष्काम प्रेमी भक्त निरुपित किया। शर्मा ने कहा कि सुदामा भगवान् श्री कृष्ण के प्रति ही समर्पित एवं निष्ठावान थे, और उनकी कृष्ण भक्ति निष्काम थी, इसलिए घोर गरीबी के चलते भी उन्होंने कभी किसी से कुछ याचना नहीं की। श्री सुदामा द्वारका गए थे, किंतु अर्थ प्राप्ति की भावना से प्रेरित होकर नहीं, बल्कि प्रभु दर्शन की आकांक्षा से ही वहां गए थे, वे एक महान् तत्वदर्शी महात्मा थे, जिन्होंने अपने लिए कभी किसी से कोई याचना ही नहीं की। उनके ह्रदय में प्रभु के प्रति अवस्थित अगाध प्रेम के वशीभूत होकर ही भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें अपने हृदय से लगाते हुए उनकी पूजा की और उनके पैर पखारकर उनका चरणोदक अपने सिर पर धारण किया, और इस तरह भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान प्रदान कर उनका अभिनंदन किया।

शर्मा ने कहा कि सुदामा के ह्रदय में प्रभु के प्रति जो निर्मल, निरपेक्ष और असीम प्रेम था, वह अतुलनीय था, जिसने उन्हें द्वारका जाने के लिए प्रेरित किया था। उनका परिवार घोर गरीबी में जीवन यापन कर रहा था, इसके बावजूद भी भगवान् श्रीकृष्ण से कुछ प्राप्त करने के मन्तव्य से नहीं, बल्कि उनके के दर्शन के निमित्त द्वारका धाम पहुंचे थे, और उनके ऐसे उच्च भाव के ही कारण भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें अपना प्रेमपात्र बनाया। वे निर्धन अवश्य थे, किंतु याचक नहीं, तन से दुर्बल थे, किंतु आत्मवैभव के धनी थे, और उनके वस्त्र फटे होने पर भी उनके मुख पर महान् ब्रह्म तेज विद्यमान था। वस्तुत: सुदामाजी ब्रह्मज्ञानी, शांतचित्त, विषयों से विरक्त और जितेन्द्रिय महात्मा थे, और उनके के प्रेम के वशीभूत होकर ही भगवान् श्री कृष्ण ने उन्हें अपने हृदय से लगाया, उनकी पूजा की और उनके पैर पखारकर उनका चरणोदक अपने सिर पर धारण किया।

आज कथा में सत्संग की महिमा, भक्ति की प्रधानता का वर्णन किया गया, साथ ही राजा जनक एवं नौ योगिश्वरों के संवाद पर भी प्रकाश डाला गया। कथा के दौरान भगवान् के अवतारों का वर्णन एवं अवधूतोपाख्यान, का भी विस्तृत वर्णन किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर