मप्रः वन विहार हो रहा गिद्ध संरक्षण के अंतरराष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित

 


- अंतरराष्ट्रीय समन्वय से घायल गिद्ध को मिली नई उड़ान

भोपाल, 12 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के राष्ट्रीय उद्यान वन विहार (जू) स्थित वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर (वीसीबीसी) आज वैज्ञानिक गिद्ध संरक्षण का एक उत्कृष्ट केंद्र बनकर उभरा है, जहाँ रेस्क्यू, पुनर्वास, टैगिंग, पुनर्स्थापन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी का समन्वित मॉडल विकसित किया गया है।

जनसम्पर्क अधिकारी केके जोशी ने रविवार को जानकारी देते हुए बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश पर्यावरण, वन एवं वन्य-जीव संरक्षण के क्षेत्र में देश का अग्रणी राज्य बना हुआ है। वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक और उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। गिद्ध संरक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत वन विहार राष्ट्रीय उद्यान में लगभग दो वर्ष आयु की एक मादा सिनेरेयस गिद्ध (एजिपीयस मोनाकस) को रायसेन जिले के हलाली डैम क्षेत्र में उसके प्राकृतिक आवास में सफलतापूर्वक छोड़ा गया।

उन्होंने बताया कि गिद्ध को 22 जनवरी को शाजापुर जिले के सुसनेर रेंज के ग्राम परसूलिया से घायल अवस्था में रेस्क्यू किया गया था। वन विहार में विशेषज्ञों द्वारा क्वारंटाइन केंद्र में इसका उपचार किया गया तथा 9 फरवरी 2026 को इसे वीसीबीसी में स्थानांतरित कर वैज्ञानिक पद्धति से पुनर्वास किया गया। वीसीबीसी में गिद्ध पर व्यापक वैज्ञानिक प्रोटोकॉल्स के साथ उपचार किया गया, जिसमें मेटल रिंग एवं माइक्रोचिप द्वारा पहचान, क्लिनिकल, व्यवहारिक एवं मॉर्फोमेट्रिक परीक्षण, उन्नत हेमेटोलॉजिकल एवं बायोकेमिकल जांच तथा निरंतर पशु-चिकित्सकीय निगरानी शामिल रही। पैर की चोट से घायल यह गिद्ध पूर्ण रूप से स्वस्थ होने के बाद ‘फिट फॉर रिलीज’ घोषित किया गया।

जनसम्पर्क अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में नव एवं वन्य-जीव संरक्षण में आधुनिक तकनीक के उपयोग को बढ़ावा दिया जाने की नीति के अंतर्गत 25 मार्च 2026 को इस गिद्ध पर जीपीएस–जीएसएम टेलीमेट्री डिवाइस लगाया गया, जिससे इसकी रीयल-टाइम निगरानी संभव हो सकी। यह कार्य डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया एवं बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के सहयोग से किया गया।

उन्होंने बताया कि रिहाई के बाद निगरानी में पाया गया कि यह गिद्ध राजस्थान होते हुए अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर 6 अप्रैल 2026 तक पाकिस्तान पहुँच गया। सिग्नल 7 अप्रैल को प्राप्त नहीं हुए तो डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया ने तत्परता दिखाते हुए डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-पाकिस्तान से संपर्क स्थापित किया। पाकिस्तान वन विभाग एवं डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-पाकिस्तान के सहयोग से इस गिद्ध को खानेवाल जिले में स्थानीय निवासियों से सुरक्षित बरामद किया गया। गिद्ध 7 अप्रैल 2026 को खानेवाल और मुल्तान क्षेत्रों में आए भीषण ओलावृष्टि तूफान के कारण उड़ान भरने में असमर्थ हो गई और जमीन पर पाई गई।

वन्यजीव अधिकारियों ने इसे रेस्क्यू कर प्राथमिक उपचार दिया गया। डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-पाकिस्तान की देखरेख में इसे स्थानीय वल्चर कैप्टिव ब्रीडिंग सेंटर में स्थानांतरित किया गया। गिद्ध को हल्की चोटें आई थीं और अब वह स्वस्थ हो रहा है। वन विहार, डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के माध्यम से डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यूएफ-पाकिस्तान के साथ लगातार संपर्क में है और गिद्ध के स्वास्थ्य की निगरानी की जा रही है। पूर्ण स्वस्थ होने के बाद इसे पुनः प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा। यह घटना प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, वैज्ञानिक निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र की महत्ता को रेखांकित करती है।

वन विभाग के वीसीबीसी ने वर्ष 2025 में भी एक घायल यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध को उपचार, टैगिंग के बाद स्वस्थ बनाकर 29 मार्च 2025 को हलाली डैम में छोड़ा था। यह गिद्ध 4300 किलोमीटर से अधिक की यात्रा कर कजाकिस्तान तक पहुँचा और बाद में भारत लौट आया। इस अध्ययन से प्रवासी मार्गों एवं संरक्षण चुनौतियों पर महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में 23 फरवरी 2026 को चार लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध एवं एक सिनेरेयस गिद्ध सहित कुल पाँच गिद्धों का सफल पुनर्वास, टैगिंग और पुनर्स्थापन किया गया। इस पहल से वन विहार गिद्ध संरक्षण के अंतर्राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। यहाँ विज्ञान, पशु-चिकित्सकीय विशेषज्ञता और आधुनिक तकनीक का समन्वित उपयोग किया जा रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर