मप्रः रीजनल स्कूल को केवीएस में मर्ज किए जाने के प्रस्ताव का विरोध, सड़कों पर उतरे विद्यार्थी
भोपाल, 18 अगस्त (हि.स.)। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मंगलवार को रीजनल स्कूल के करीब 300 से 400 छात्र-छात्राएं रीजनल स्कूल को केंद्रीय विद्यालय संगठन (केवीएस) में मर्ज किए जाने के प्रस्ताव के विरोध में सड़क पर उतर आए।
बच्चों के हाथों में ‘सेव डीएमएस’ समेत अलग-अलग पोस्टर थे। छात्रों ने रीजनल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. एसके गुप्ता को ज्ञापन सौंपकर संविलयन का विरोध दर्ज कराया। साथ ही मांगें नहीं माने जाने पर चरणबद्ध आंदोलन करने की चेतावनी दी।
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता विवेक त्रिपाठी ने इसे राजधानी में हुआ प्रदेश का पहला ‘जेन अल्फा प्रोटेस्ट’ बताया। उन्होंने कहा कि इससे पहले विदिशा में बस किराए से जुड़े मुद्दे को लेकर गांव के बच्चों द्वारा जेन अल्फा प्रोटेस्ट किए जाने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन किसी शैक्षणिक संस्थान के मुद्दे को लेकर भोपाल में छात्रों का यह पहला ऐसा प्रदर्शन है।
प्रदर्शन के दौरान छात्र-छात्राओं के हाथों में ‘सेव डीएमएस’ लिखे पोस्टर नजर आए। डीएमएस यानी डेमोंस्ट्रेशन मल्टीपर्पज स्कूल को हिंदी में प्रायोगिक बहुउद्देशीय विद्यालय कहा जाता है। छात्रों और अभिभावकों का कहना है कि रीजनल स्कूल सामान्य स्कूल नहीं है, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग और नवाचार के लिए इसकी अलग पहचान है।
विवेक त्रिपाठी के अनुसार एनसीईआरटी के अंतर्गत शिक्षा में नवाचार और शैक्षणिक प्रयोग के लिए चार शैक्षणिक प्रयोगशालाएं दिसंबर 1965 से प्रायोगिक बहुउद्देशीय विद्यालय के नाम से भोपाल, अजमेर, मैसूर और भुवनेश्वर में संचालित होती रही हैं।
उन्होंने कहा कि इन विद्यालयों को केंद्रीय विद्यालय संगठन में शामिल किए जाने की प्रक्रिया का ही छात्र विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन स्कूलों की मूल अवधारणा शिक्षा में नए प्रयोग और नवाचार करना है। यहां किए गए शैक्षणिक प्रयोगों के आधार पर देश की स्कूली शिक्षा में बदलाव किए जाते रहे हैं।
छात्रों की मुख्य मांग है कि रीजनल स्कूल का केंद्रीय विद्यालय संगठन में संविलयन नहीं किया जाए। उनका कहना है कि स्कूल की अलग शैक्षणिक पहचान और प्रयोगात्मक स्वरूप को बनाए रखा जाए। प्रदर्शन के बाद छात्रों ने प्राचार्य प्रो. एसके गुप्ता को ज्ञापन सौंपकर अपनी मांगें रखीं। ज्ञापन के जरिए संविलयन की प्रक्रिया को रोकने और मौजूदा स्वरूप को बनाए रखने की मांग की गई। छात्रों ने स्पष्ट किया कि यदि उनकी मांगों पर कार्रवाई नहीं होती है तो आंदोलन को चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाएगा।
प्रदर्शन में शामिल छात्रों के अभिभावकों को सबसे बड़ी चिंता केंद्रीय विद्यालय की प्रवेश नीति को लेकर है। अभिभावकों का कहना है कि केंद्रीय विद्यालयों में प्रवेश की प्राथमिकताएं अलग हैं। ऐसे में रीजनल स्कूल के मौजूदा छात्रों और भविष्य में सामान्य परिवारों के बच्चों के प्रवेश को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कुछ अभिभावकों और स्कूल स्टाफ के माध्यम से यह जानकारी सामने आई, जिसके बाद अभिभावकों ने आपस में चर्चा शुरू की। उनका कहना है कि इतने बड़े निर्णय से पहले छात्रों और अभिभावकों से भी बात की जानी चाहिए थी। अभिभावकों के मुताबिक स्कूल में नर्सरी से 12वीं तक करीब 1000 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। अलग-अलग कक्षाओं में दो सेक्शन हैं। 11वीं और 12वीं में कॉमर्स और आर्ट्स सहित अलग-अलग विषयों की पढ़ाई होती है।
विवेक त्रिपाठी ने कहा कि जिस तरह बड़ी संख्या में छात्र खुद अपने स्कूल की पहचान बचाने के लिए सड़क पर आए हैं, वह चिंता का विषय है। उन्होंने सरकार से संविलयन के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की। उन्होंने कहा कि शिक्षा में प्रयोग और नवाचार के लिए स्थापित इन चार विद्यालयों की अलग भूमिका है। इसलिए इनके संविलयन से पहले इसके उद्देश्य और भविष्य पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने छात्रों के आंदोलन को समर्थन देते हुए कहा कि सरकार को छात्रों के हित में फैसला लेना चाहिए।
इस प्रदर्शन की खास बात यह रही कि इसमें बड़ी संख्या में स्कूली उम्र के बच्चे खुद अपने स्कूल के भविष्य से जुड़े मुद्दे को लेकर सड़क पर उतरे। यही वजह है कि इसे ‘जेन अल्फा प्रोटेस्ट’ कहा जा रहा है। भोपाल में किसी शैक्षणिक संस्थान के मुद्दे पर इस तरह का यह पहला जेन अल्फा प्रोटेस्ट बताया जा रहा है। इससे पहले विदिशा में बस किराए के मुद्दे को लेकर गांव के बच्चों के प्रदर्शन को जेन अल्फा प्रोटेस्ट के तौर पर देखा गया था। भोपाल का यह प्रदर्शन सीधे एक शैक्षणिक संस्थान के अस्तित्व और उसके स्वरूप से जुड़ा होने के कारण अलग माना जा रहा है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर