मप्र पुलिस की संवेदनशील पहल से लौटी मासूमों की मुस्कान, भटके बच्चों को मिला परिवार का सहारा

 




भोपाल, 22 अगस्त (हि.स.)। किसी मासूम बच्चे का घर से बिछड़ जाना केवल एक परिवार के लिए चिंता और पीड़ा का विषय नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए संवेदनशील चुनौती है। डर, घबराहट, नासमझी अथवा किसी परिस्थिति के कारण घर से भटके बच्चों की आंखों में अपनों से बिछड़ने का दर्द होता है। ऐसे समय में मध्य प्रदेश पुलिस और एसओएस बाल ग्राम जैसी बाल संरक्षण संस्थाओं के समन्वित एवं संवेदनशील प्रयास इन बच्चों के लिए उम्मीद की किरण बन रहे हैं।

इसी दिशा में पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाणा के मार्गदर्शन में पुलिस उप महानिरीक्षक डॉ. विनीत कपूर के नेतृत्‍व में सामुदायिक पुलिसिंग के प्रयासों के माध्यम से पुलिस, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को साथ जोड़कर समाज के कमजोर एवं जरूरतमंद वर्गों के लिए विभिन्न गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।

पुलिस मुख्यालय द्वारा शनिवार को जानकारी दी गई कि बाल संरक्षण के क्षेत्र में पुलिस और एसओएस बाल ग्राम जैसी संस्थाएं आपसी समन्वय से ऐसे बच्चों की सुरक्षा, देखभाल, काउंसलिंग, पहचान और परिवार से पुनर्मिलन के लिए निरंतर कार्य कर रही हैं। पुलिस की त्वरित कार्रवाई और संस्थाओं की संवेदनशील भूमिका के इस समन्वय से न केवल भटके हुए बच्चों को सुरक्षित संरक्षण मिल रहा है, बल्कि पुलिस की मानवीय एवं जनसरोकार वाली भूमिका भी समाज के सामने प्रभावी रूप से सामने आ रही है। मध्य प्रदेश पुलिस की कम्युनिटी पुलिसिंग की इस पहल का उद्देश्य पुलिस और समाज के बीच विश्वास, सहयोग और संवेदनशीलता को और मजबूत करना है।

डर के कारण ट्रेन से उतर गए भाई-बहन, सीमित जानकारी से मिला परिवार

पुलिस मुख्यालय के अनुसार, 15 अगस्त की रात रायसेन में एक बालक और एक बालिका डरे-सहमे और भटकते हुए मिले। दोनों अपने एक दोस्त के साथ घर से निकले थे और ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान वे इस बात से घबरा गए कि उन्हें कहां ले जाया जा रहा है और डर के कारण बीच रास्ते में ही ट्रेन से उतर गए। बच्चों के पास किसी परिजन का मोबाइल नंबर नहीं था। उन्हें केवल अपने घर की सीमित जानकारी थी।

पुलिस ने दोनों बच्चों को पुलिस ने तत्काल बच्चों को सुरक्षित संरक्षण में लिया और बाल संरक्षण संस्था के सहयोग से उनके परिजनों की तलाश शुरू की। जबलपुर पुलिस कंट्रोल रूम सहित संबंधित पुलिस इकाइयों से समन्वय कर उपलब्ध पते के आधार पर परिवार की पहचान की गई। आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने के बाद दोनों बच्चों को बाल कल्याण समिति के माध्यम से उनके माता-पिता को सौंप दिया गया।

दिल्ली से भटककर भोपाल पहुंची किशोरी

एक 15-16 वर्षीय किशोरी गलती से दिल्ली से आने वाली ट्रेन में बैठ गई और भटकते हुए भोपाल पहुंच गई। डरी हुई किशोरी ने स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए अपने बारे में एक मनगढ़ंत कहानी बताई। भोपाल एवं छतरपुर पुलिस कंट्रोल रूम से संपर्क कर जानकारी का सत्यापन कराया गया। जांच में सामने आया कि किशोरी के माता-पिता जीवित हैं और वे उसे लगातार तलाश रहे हैं। उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज थी। डर के कारण किशोरी ने अपना हुलिया भी कुछ बदल लिया था, लेकिन फोटो के मिलान से उसकी वास्तविक पहचान सामने आ गई। पुलिस और संस्था के समन्वित प्रयास से मात्र तीन दिन के भीतर किशोरी को उसके परिवार से मिला दिया गया।

रेलवे ट्रैक पर भटक रहा था 7-8 वर्षीय बच्चा, डायल-112 ने बचाया

रानी कमलापति रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे ट्रैक पर भटकता मिला एक 7-8 वर्षीय बच्चा भी पुलिस की त्वरित कार्रवाई से सुरक्षित बचाया गया। बच्चा अपनी पहचान के संबंध में सीमित जानकारी दे पा रहा था और केवल गोविंदपुरा का नाम बता रहा था। पुलिस की तत्परता और थाना गोविंदपुरा के स्तर पर किए गए समन्वय से पता चला कि बच्चे की गुमशुदगी पहले से दर्ज थी। आवश्यक सत्यापन के बाद बच्चे को सुरक्षित उसके परिवार तक पहुंचाया गया।

एक अन्य मामले में एक किशोर लंबे समय तक अपनी पहचान और पते के संबंध में सही जानकारी नहीं दे पा रहा था। वह स्वयं को सागर का निवासी बता रहा था, लेकिन जांच में वहां उसके संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली। बाल संरक्षण संस्था के कर्मचारियों ने संवेदनशीलता के साथ लगातार बच्चे से संवाद और काउंसलिंग की। बाद में बच्चे द्वारा दी गई नई जानकारी के आधार पर संबंधित क्षेत्र की पुलिस से संपर्क किया गया। वहां एक बच्चे की गुमशुदगी की जानकारी मिली और फोटो के मिलान से उसकी पहचान सुनिश्चित हुई। इस प्रकार लंबे समय से परिवार से दूर रहा बच्चा अंततः अपने घर पहुंच सका।

मध्य प्रदेश से बाहर भी पुलिस समन्वय से हुई बच्चों की घर वापसी

मध्य प्रदेश पुलिस और एसओएस बाल ग्राम के प्रयास केवल प्रदेश तक सीमित नहीं हैं। जनवरी माह में 14-15 वर्षीय एक किशोर को सुरक्षित रूप से उत्तर प्रदेश के झांसी तक पहुंचाया गया। इसी प्रकार 15 वर्षीय एक अन्य भटके हुए बच्चे के संबंध में पुलिस कंट्रोल रूम के माध्यम से बिहार के भभुआ जिले के मोहनिया थाना पुलिस से संपर्क किया गया और उसे उसके परिवार से मिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

वर्तमान में राजगढ़ जिले के खुजनेर क्षेत्र से संबंधित एक बच्चे तथा बिहार के सीवान क्षेत्र के एक बच्चे को भी उनके परिवार तक सुरक्षित पहुंचाने की प्रक्रिया जारी है।

भटके बच्चे को अपने पास रखने के बजाय तत्काल पुलिस को सूचना दें

यदि किसी नागरिक को कोई बच्चा अकेला, भटका हुआ या असहाय अवस्था में दिखाई देता है, तो उसे अपने स्तर पर बच्चे को लंबे समय तक अपने पास रखने के बजाय तत्काल पुलिस या बाल सहायता तंत्र को सूचना देनी चाहिए। बच्चे को सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी संबंधित पुलिस एवं बाल संरक्षण व्यवस्था को सौंपना ही सबसे सुरक्षित और उचित कदम है।

नागरिक तत्काल डायल-112 अथवा बाल सहायता सेवा 1098 पर सूचना दे सकते हैं। सूचना मिलने पर पुलिस और बाल संरक्षण संस्थाएं बच्चे को सुरक्षित संरक्षण प्रदान कर आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसके परिवार तक पहुंचाने का कार्य करती हैं।

ऐसे होती है एक भटके बच्चे की घर वापसी

भटके हुए बच्चे की घर वापसी की प्रक्रिया में सबसे पहले पुलिस द्वारा उसे सुरक्षित संरक्षण में लेकर आवश्यक प्रविष्टि एवं मेडिकल परीक्षण कराया जाता है। इसके बाद नियमानुसार बच्चे को सुरक्षित बाल संरक्षण संस्था में रात्रि प्रवास के लिए भेजकर अगले दिन बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। संस्था के प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं द्वारा बच्चे की संवेदनशीलता के साथ काउंसलिंग कर उसके घर, माता-पिता एवं पते से संबंधित जानकारी जुटाई जाती है। प्राप्त जानकारी के आधार पर पुलिस कंट्रोल रूम के माध्यम से संबंधित जिले अथवा राज्य की पुलिस से समन्वय कर गुमशुदगी की जानकारी का सत्यापन किया जाता है। पहचान सुनिश्चित होने पर बाल कल्याण समिति की आवश्यक प्रक्रिया के तहत बच्चे को सुरक्षित रूप से उसके माता-पिता अथवा वैध अभिभावक को सौंप दिया जाता है।

जिन बच्चों का कोई सहारा नहीं, उनके लिए भी संवेदनशील व्यवस्था

यदि किसी बच्चे के माता-पिता जीवित नहीं हैं, तो संस्था द्वारा उसके दादा-दादी अथवा अन्य उपयुक्त रिश्तेदारों की तलाश कर बच्चे को उनके संरक्षण में सौंपने का प्रयास किया जाता है। बच्चे की शिक्षा एवं पोषण सुनिश्चित करने के लिए संस्था द्वारा आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है। वर्तमान में भोपाल और विदिशा में ऐसे 83 बच्चे इस योजना का लाभ ले रहे हैं।

यदि किसी बच्चे का कोई पारिवारिक सहारा नहीं मिलता, तो निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के बाद उसे ‘Legally Free for Adoption’ घोषित किए जाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है, ताकि उसे एक सुरक्षित और स्थायी परिवार मिल सके।

SOS चिल्ड्रेन्स विलेजेज इंडिया : बच्चों और परिवारों को सशक्त बनाने की पहल

SOS चिल्ड्रेन्स विलेजेज इंडिया एक स्वतंत्र, गैर-सरकारी और गैर-लाभकारी संस्था है, जो माता-पिता की देखभाल से वंचित एवं परित्यक्त बच्चों के संरक्षण, शिक्षा, स्वास्थ्य और समग्र विकास के साथ-साथ कमजोर परिवारों को सशक्त बनाने के लिए कार्य करती है। वर्ष 1964 से भारत में कार्यरत संस्था ने अब तक 65,000 से अधिक बच्चों तक पहुंच बनाई है। संस्था का Family Like Care Model बच्चों को परिवार जैसा सुरक्षित और स्नेहपूर्ण वातावरण उपलब्ध कराता है, वहीं Family Strengthening Programme के माध्यम से कमजोर परिवारों, महिलाओं और बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल विकास एवं आजीविका के क्षेत्र में सहयोग प्रदान किया जाता है। बाल संरक्षण के क्षेत्र में पुलिस के साथ समन्वय करते हुए संस्था भटके या परिवार से बिछड़े बच्चों को सुरक्षित संरक्षण, संवेदनशील काउंसलिंग और आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराने तथा पुलिस एवं बाल कल्याण समिति के साथ समन्वय से उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर