मप्र के सीधी जिले में 2.5 लाख साल पुराने हाथी के जीवाश्म मिलने का दावा

 


सीधी, 18 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश के सीधी जिले के सिहावल ब्लॉक स्थित कोरौली कला गांव की अतरैला पहाड़ी में प्राचीन प्रोबोसिडियन कुल (हाथियों के पूर्वज) के जीवाश्म अवशेष मिले हैं। पीएमश्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, सतना की वैज्ञानिक टीम के प्रारंभिक सर्वेक्षण में यह दावा किया गया है। इन जीवाश्मों की आयु लगभग 25 हजार से ढाई लाख वर्ष पुरानी हो सकती है। टीम ने सीधी जिला प्रशासन से इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों को तुरंत संरक्षित करने की मांग की है।

दरअसल, प्राणी शास्त्र विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. हर्षित सोनी के नेतृत्व में डॉ. ऋषभ देव साकेत और पुरातत्वविद डॉ. धीरेंद्र शर्मा की टीम ने इस जगह का दौरा किया। स्थल परीक्षण के दौरान वैज्ञानिक दल को बड़े आकार के शाकाहारी स्तनधारी जीवों के दांतों के टुकड़े और कुछ अस्थि खंड मिले हैं। इन दांतों में एनामेल प्लेट, डेंटिन और घिसाव के निशान साफ दिख रहे हैं। यह निशान प्रारंभिक रूप से हाथी कुल (प्रोबोसिडियन) के प्राचीन जीवों की ओर इशारा करते हैं।

डॉ. हर्षित सोनी ने बुधवार को बताया कि जीवाश्मीकरण की प्रक्रिया से गुजरी अस्थियों के संकेतों के साथ कठोर अवसादी मिट्टी के कई खंड भी मौके पर मिले हैं। इनमें पौधों की जड़ों के निशान और सूक्ष्म छिद्र संरचनाएं दिखाई देती हैं, जो प्राचीन मिट्टी या पैलियोसोल के संकेत हो सकते हैं। यह प्रारंभिक खोज भविष्य में प्राचीन पर्यावरण और जलवायु को समझने में मददगार साबित हो सकती है। प्रारंभिक जांच से लगता है कि यह क्षेत्र सोन नदी घाटी के प्राचीन अवसादी निक्षेपों से जुड़ा है। सोन नदी घाटी के आसपास पहले भी प्लीस्टोसीन काल के विशाल स्तनधारी जीवों के जीवाश्म प्राप्त होने के प्रमाण मिलते रहे हैं।

इस मामले में विशेषज्ञों ने उम्र की सटीक जानकारी के लिए यूरेनियम डेटिंग की जरूरत बताई है। उपलब्ध जीवाश्मों का न तो डीएनए परीक्षण संभव है और न ही कार्बन डेटिंग। प्रारंभिक संकेतों से प्रोबोसिडियन कुल के हाथियों के पूर्वजों की आधिकारिक पुष्टि ईएसआर तकनीक से भी नहीं कराई जा सकती है। इसके लिए यूरेनियम डेंटिंग, विस्तृत भूवैज्ञानिक अध्ययन और तुलनात्मक विश्लेषण जरूरी है।

कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एससी राय ने बताया कि मौजूदा सर्वेक्षण प्रारंभिक स्तर का है, इसका उद्देश्य संभावित वैज्ञानिक महत्व को रेखांकित करना है। सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि स्थल के कुछ हिस्सों में स्थानीय गतिविधियों के कारण जीवाश्म अवशेष क्षतिग्रस्त हुए हैं।

डॉ. हर्षित सोनी ने सीधी जिला प्रशासन से इन जीवाश्म स्थलों को बिना देरी के संरक्षित करने की मांग की है, ताकि भविष्य में नियंत्रित वैज्ञानिक अध्ययन हो सके। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग से उच्चस्तरीय रिसर्च के लिए इन जीवाश्मीय साक्ष्यों को सुरक्षित रखना बेहद आवश्यक है। उन्होंने बताया कि यह शुरुआती रिसर्च विंध्य की प्राकृतिक एवं वैज्ञानिक धरोहर है। महाविद्यालय प्रबंधन भी इस संभावित जीवाश्म स्थल के व्यवस्थित अध्ययन के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर