सीहोर में ढोल-ताशों के साथ निकला भगोरिया का जुलूस, पारंपरिक वेशभूषा में थिरके आदिवासी

 


- उल्लास और उमंग का उत्सव है भगोरिया मेला

सीहोर, 01 मार्च (हि.स.)। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में ग्राम बिलकिसगंज में रविवार को आदिवासी समाज का प्रमुख भगोरिया पर्व पारंपरिक उल्लास और भारी उत्साह के साथ मनाया गया। इस दौरान ढोल-ताशों की गूंज के साथ गांव में एक विशाल जुलूस निकाला गया, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष और युवा शामिल हुए।

रविवार को हाट बाजार होने के कारण बाजार में भी भारी रौनक रही और पुलिस प्रशासन की कड़ी सुरक्षा के बीच पूरा आयोजन उल्लास के साथ शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। आदिवासी समाज द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत उपगल्ला मंडी प्रांगण में अतिथियों के स्वागत से हुई। इसके बाद 14 ढोल-ताशों की गूंज के साथ जुलूस की शुरुआत हुई। यह जुलूस गांव के प्रमुख मार्गों, जिसमें पुलिया चौराहा और बस स्टैंड शामिल थे, से होते हुए बिलकिसगंज थाना प्रांगण तक पहुंचा। इसके बाद जुलूस थाने से लौटकर पुनः उपगल्ला मंडी पहुंचा, जहाँ इसका समापन किया गया।

जुलूस में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में आदिवासी महिला-पुरुष और युवाओं ने भाग लिया। सभी ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर अपनी समृद्ध संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत की। रंग-बिरंगे परिधान, पारंपरिक आभूषण और लोक वाद्यों की धुन पर युवक-युवतियां उत्साहपूर्वक नृत्य करते नजर आए। रविवार को गांव में हाट बाजार होने के कारण बाजार में विशेष रौनक देखी गई। उत्सव में शामिल आदिवासी समुदाय ने जमकर खरीदारी की और मिठाइयों तथा स्थानीय व्यंजनों की दुकानों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी। इस दौरान बच्चों और युवाओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। पूरे आयोजन के दौरान पुलिस प्रशासन चप्पे-चप्पे पर चौकसी में तैनात रहा, जिससे वातावरण सुरक्षित और उत्सवमय बना रहा।

गौरतलब है कि भगोरिया मेला प्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर, खरगौन, बड़वानी और धार के साथ ही सीहोर जिले के भील, भिलाला और बारेला जनजाति द्वारा होली से सात दिन पहले मनाया जाने वाला सात दिवसीय प्रसिद्ध जनजातीय उत्सव है। फसल कटाई के जश्न के रूप में होली के सात दिन पहले शुरू होने वाला यह मेला, फसल कटाई के बाद जनजातीय समुदाय द्वारा उल्लास के साथ मनाए जाने वाला त्यौहार है। भगोरिया में रंग-गुलाल लगाने, नृत्य-संगीत और खरीदारी करने की उदात्त भावनाएँ मुखरता से प्रदर्शित होती है।

फागुन महीने में जब चारों ओर प्रकृति में नया उल्लास होता हैं तब पश्चिम निमाड़ से झाबुआ तक के जनजातीय क्षेत्रों के साप्ताहिक हाट बाजार भगोरिया के रंग में रंगे होते हैं। मेले में हर तरफ फागुन और इन्द्रधनुषी प्रेम के रंग नज़र आते हैं। इन मेलों में मुख्य रूप से होली के लिए खरीददारी करने के लिए लोग आते हैं। गैर जनजातीय समुदाय के लिए भी भगौरिया के साप्ताहिक हाट बाजार विशिष्ट होते हैं। इसका सभी व्यापारियों को भी इंतजार रहता है। इसमें दुकानदार साल भर की कमाई, भगोरिया के साप्ताहिक बाजार से कर लेते हैं। भगोरिया हाट (बाजार) में जरूरत की वस्तुएं, मिठाइयाँ और पारंपरिक आभूषण बिकते हैं।

भगोरिया मेले में बड़े-बड़े ढोल और मांदल की थाप पर पारंपरिक जनजातीय नृत्य किया जाता है, जिसमें विभिन्न दल ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेते हैं। वाद्य यंत्रों के साथ शामिल होने वाले विभिन्न दल एक ही रंग के वस्त्रों में अपनी अलग पहचान के साथ छटा बिखेरते हैं। महिलाओं के साथ पुरूष भी चांदी के आभूषणों से सज्जित होकर पारम्परिक वाद्य यंत्रों की ताल पर थिरकते हैं। चांदी के आभूषण भील जनजाति में समृद्धि के प्रतीक हैं।

भगोरिया मेल-मिलाप, आनंद और उल्लास का उत्सव है। माना जाता है कि इसमें युवा अपनी पसंद के साथी को गुलाल लगाकर या पान खिलाकर अपने प्रेम को अभिव्यक्त करते हैं। भगोरिया में मनपसंद के साथी के साथ भागकर विवाह करने की मान्यता भी प्रचलित है। भगोरिया पर्व होली के सात दिन पहले से शुरू होकर होलिका दहन तक चलता है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के झाबुआ, आलीराजपुर, धार, बड़वानी, खरगोन और सीहोर जिलों के विभिन्न गाँवों में साप्ताहिक बाजार के दिन आयोजित होता है। भगोरिया मेला जनजातीय संस्कृति, उमंग और जीवन को करीब से जानने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 4 मार्च 2025 को 'भगोरिया पर्व' को राजकीय उत्सव घोषित किया था।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर